‘सदन से ऊपर न PM हैं, न नेता प्रतिपक्ष’: अविश्वास प्रस्ताव गिरने के बाद ओम बिरला का ‘विपक्ष’ को दो टूक जवाब

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Om Birla No Confidence Motion: भारतीय संसद के इतिहास में करीब चार दशकों के बाद एक ऐसा अवसर आया जब लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। बुधवार को भारी हंगामे के बीच विपक्ष का यह प्रस्ताव ध्वनि मत से खारिज हो गया।

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान खुद को सदन की कार्यवाही से दूर रखने वाले अध्यक्ष ओम बिरला ने गुरुवार को वापस आसन संभाला और पहली बार अपनी चुप्पी तोड़ी। उनके संबोधन ने न केवल विपक्ष के आरोपों का जवाब दिया, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में ‘नियम’ किसी भी व्यक्ति के पद से बड़े होते हैं।

अविश्वास प्रस्ताव का गिरना और ओम बिरला की ‘नैतिक’ जीत

लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के लिए करीब 118 विपक्षी सांसदों के समर्थन से यह अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। विपक्षी दलों का मुख्य आरोप था कि ओम बिरला का व्यवहार “पक्षपातपूर्ण” रहा है और वे सदन में निष्पक्षता बनाए रखने में विफल रहे हैं। हालांकि, दो दिनों तक चली तीखी बहस के बाद जब बुधवार को मतदान की बारी आई, तो पीठासीन अध्यक्ष जगदंबिका पाल के नेतृत्व में हुए ध्वनि मत में यह प्रस्ताव गिर गया। प्रस्ताव गिरने के बाद सदन को दिनभर के लिए स्थगित कर दिया गया था।

‘नियमों की विरासत’: न प्रधानमंत्री बड़े, न नेता प्रतिपक्ष

गुरुवार को सदन को संबोधित करते हुए ओम बिरला ने अत्यंत कड़े शब्दों में कहा कि कुछ सदस्यों को लगता है कि नेता प्रतिपक्ष (LoP) सदन से ऊपर हैं और वे किसी भी विषय पर बोल सकते हैं, लेकिन ऐसा कोई विशेषाधिकार किसी को प्राप्त नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया, “चाहे प्रधानमंत्री हों, मंत्री हों, विपक्ष के नेता हों या अन्य सदस्य, सभी को नियमों के अनुसार ही बोलने का अधिकार है।” बिरला ने जोर देकर कहा कि ये नियम स्वयं इसी सदन ने बनाए हैं और उन्हें यह व्यवस्था विरासत में मिली है, जिसे बनाए रखना उनका संवैधानिक दायित्व है।

सदन में ‘नफरत’ और ‘निष्पक्षता’ की जंग

प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष पर जोरदार हमला करते हुए कहा कि स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना लोकतंत्र की नींव पर सवाल उठाना है। उन्होंने ओम बिरला की सराहना करते हुए कहा कि नैतिकता का पाठ उन्हें न पढ़ाया जाए, क्योंकि बिरला ने अविश्वास प्रस्ताव के दौरान खुद को कुर्सी से दूर रखकर एक उच्च मानक स्थापित किया, जबकि कांग्रेस के समय में स्पीकर खुद सदन में बैठते थे।

दूसरी ओर, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उन्हें ‘सदन में बोलने नहीं दिया जाता’। उन्होंने तर्क दिया कि यह सदन भारत के लोगों की अभिव्यक्ति है और जब भी वे बोलते हैं, उनका माइक बंद कर दिया जाता है या उन्हें रोक दिया जाता है। राहुल ने यहाँ तक कहा कि लोकसभा के इतिहास में पहली बार नेता प्रतिपक्ष को बोलने से रोका गया है। इन आरोपों का जवाब देते हुए अमित शाह ने आंकड़े पेश किए और कहा कि कांग्रेस पार्टी ने 18वीं लोकसभा में 157 घंटे से अधिक बोला है, फिर यह कहना कि उन्हें मौका नहीं मिला, केवल सदन को बदनाम करने का प्रयास है।

ओम बिरला ने अपने संबोधन में उन सभी सांसदों का आभार व्यक्त किया जिन्होंने उन पर विश्वास जताया। उन्होंने कहा कि उनका हमेशा यह प्रयास रहा है कि सदन की कार्यवाही निष्पक्षता, अनुशासन और संतुलन के साथ चले। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब कोई सांसद मर्यादा भंग करता है, तभी वे कठोर कदम उठाते हैं। उन्होंने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उन्होंने हमेशा सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों को बराबर बोलने का मौका दिया है। उनके अनुसार, यह आसन किसी व्यक्ति का नहीं है, बल्कि 140 करोड़ जनता का है और वे पूरी निष्ठा व संवैधानिक मर्यादा के साथ अपनी जिम्मेदारी निभाते रहेंगे।

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