इंजीनियर युवराज की मौत पर नोएडा CEO हटाए गए, लेकिन बड़ा सवाल बरकरार, बाकी जिम्मेदारों पर कार्रवाई कब?
नोएडा: ग्रेटर नोएडा में इंजीनियर युवराज की दर्दनाक मौत के मामले ने प्रशासनिक व्यवस्था की पोल खोल दी है। शासन ने कार्रवाई करते हुए नोएडा प्राधिकरण के सीईओ डॉ. लोकेश एम को पद से हटाकर प्रतीक्षारत कर दिया है, लेकिन इस कदम के बाद भी सबसे बड़ा सवाल जस का तस बना हुआ है कि इस हादसे के अन्य जिम्मेदारों पर कार्रवाई आखिर कब होगी।
सिर्फ प्राधिकरण नहीं, बचाव एजेंसियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में
युवराज की मौत को लेकर अब यह बहस तेज हो गई है कि क्या इसके लिए सिर्फ प्राधिकरण की लापरवाही जिम्मेदार थी या फिर घटनास्थल पर मौजूद दमकल विभाग, एसडीआरएफ और पुलिस भी बराबर के दोषी हैं। प्रत्यक्षदर्शियों और मृतक के परिजनों का कहना है कि इंजीनियर उनके सामने ही धीरे-धीरे मौत के मुंह में समाता रहा, जबकि तमाम सरकारी एजेंसियां मौके पर मौजूद थीं।
80 जवान मौजूद, फिर भी नहीं बची जान
घटनास्थल पर दमकल विभाग, एसडीआरएफ और पुलिस के करीब 80 जवान तैनात थे। इसके बावजूद युवराज को बचाने के लिए कोई ठोस और प्रभावी प्रयास नजर नहीं आया। बचाव एजेंसियों की ओर से घने कोहरे और शून्य दृश्यता का हवाला देकर खुद को बचाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन सवाल यह है कि ऐसे हालात से निपटने के लिए ही तो इन्हें विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है।
डिलीवरी बॉय की हिम्मत, सिस्टम की बेबसी
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि जहां प्रशिक्षित जवान मूकदर्शक बने रहे, वहीं एक डिलीवरी बॉय, जिसके पास कोई सुरक्षा उपकरण नहीं था, रस्सी के सहारे करीब 30 फीट गहरे पानी में उतर गया। इसके बावजूद पुलिस, दमकल और एसडीआरएफ के जवान तमाशबीन बने रहे। यही सवाल मृतक के पिता भी उठा रहे हैं कि जब एक आम युवक कोशिश कर सकता है तो जिम्मेदार एजेंसियां क्यों हाथ पर हाथ धरे रहीं।
प्रदेश की शो विंडो जनपद की हकीकत आई सामने
नोएडा और ग्रेटर नोएडा को प्रदेश का हाईटेक और शो विंडो जनपद कहा जाता है। सरकार अक्सर इसकी चमक-दमक और आधुनिक ढांचे की तस्वीरें दिखाकर उपलब्धियां गिनाती है, लेकिन युवराज की मौत ने जमीनी सच्चाई उजागर कर दी है। कागजों में अत्याधुनिक नजर आने वाला सिस्टम मौके पर पूरी तरह खोखला साबित हुआ।
संसाधनों की कमी या जिम्मेदारी से बचने की कोशिश?
इस घटना ने यह भी सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर जिले को पर्याप्त संसाधन क्यों नहीं उपलब्ध कराए गए। युवराज की मौत के लिए सिर्फ प्राधिकरण ही नहीं, बल्कि वे सभी जिम्मेदार हैं, जिन्हें समय रहते जरूरी उपकरण और सुविधाएं मुहैया करानी थीं। लोगों का कहना है कि अगर बचाव दल पूरी तरह तैयार होता, तो शायद एक युवा इंजीनियर की जान बचाई जा सकती थी।
ढाई घंटे तक तड़पता रहा युवराज, सिस्टम रहा नाकाम
करीब ढाई घंटे तक युवराज जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करता रहा, लेकिन बचाव एजेंसियां कोई कारगर रणनीति नहीं बना सकीं। जिन एजेंसियों को कठिन परिस्थितियों में विवेक और सूझबूझ से काम करने, नियमित प्रशिक्षण और मॉक ड्रिल के जरिए तैयार रहने की जिम्मेदारी है, वे असल वक्त पर पूरी तरह फेल साबित हुईं।
लोगों में गुस्सा, सड़कों पर उतरा आक्रोश
इस घटना के बाद आम लोगों में भारी रोष है। गुस्साए लोगों ने कैंडल मार्च निकालकर अपना विरोध दर्ज कराया और सवाल उठाया कि जिन एजेंसियों के भरोसे लाखों लोगों की जान है, वे ऐसी आपात स्थिति से निपटने के लिए कितनी तैयार हैं। अब लोगों की मांग साफ है कि सिर्फ एक अधिकारी को हटाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि हर उस जिम्मेदार पर कार्रवाई होनी चाहिए, जिसकी लापरवाही से एक होनहार इंजीनियर की जान चली गई।