‘प्रधानों को प्रशासक बनाकर नहीं रखा जा सकता…’ इलाहाबाद हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी, सरकार से मांगा जवाब
प्रयागराज: उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किए जाने के मामले पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में बने रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने यह भी माना कि इस तरह की नियुक्तियां डिवीजन बेंच के पूर्व आदेशों के उल्लंघन और न्यायालय की अवमानना की श्रेणी में आ सकती हैं।
हालांकि, हाई कोर्ट ने फिलहाल इस मामले में किसी प्रकार की अंतरिम रोक लगाने से इनकार किया है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ में हुई।
डिवीजन बेंच के आदेश के उल्लंघन पर जताई आपत्ति
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने का निर्णय डिवीजन बेंच के आदेश के विपरीत प्रतीत होता है। कोर्ट ने इस पर गंभीर आपत्ति जताते हुए राज्य सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है।
अदालत ने राज्य सरकार को अंतिम अवसर देते हुए निर्देश दिया कि अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट और उससे जुड़े सभी दस्तावेज रिकॉर्ड पर प्रस्तुत किए जाएं।
सरकार से मांगी आयोग और चुनाव की समयसीमा की जानकारी
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि राज्य सरकार ने पंचायत चुनावों से संबंधित किसी आयोग का गठन किया है, तो उसकी पूरी जानकारी अदालत के समक्ष प्रस्तुत की जाए। साथ ही चुनाव कराने की संभावित समयसीमा को भी स्पष्ट रूप से हलफनामे में दर्ज करने को कहा गया है।
मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई को दोपहर दो बजे निर्धारित की गई है।
पंचायतों का कार्यकाल खत्म होने के बाद हुआ था फैसला
प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायतों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो गया था। इसके बाद राज्य सरकार ने आदेश जारी कर मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक के रूप में कार्यभार सौंप दिया था।
इसी निर्णय को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता अरविंद राठौर की ओर से हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। याचिका में प्रशासकों की नियुक्ति समाप्त कर जल्द से जल्द पंचायत चुनाव कराने की मांग की गई है।
ओबीसी आरक्षण और मतदाता सूची के कारण टले चुनाव
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव मई 2026 में प्रस्तावित थे, लेकिन मतदाता सूची समय पर प्रकाशित नहीं होने और ओबीसी आरक्षण की प्रक्रिया पूरी न होने के कारण चुनाव निर्धारित समय पर नहीं कराए जा सके।
इसके लिए राज्य सरकार ने पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया है, जिसे विभिन्न जिलों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का अध्ययन कर रिपोर्ट सौंपने के लिए छह महीने का समय दिया गया है।
जब तक आयोग अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं कर देता, तब तक सरकार ने ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में जिम्मेदारी सौंपने का निर्णय लिया था, जिसे अब अदालत में चुनौती दी गई है।