प्रोजेक्ट-75I से भारत की पनडुब्बी को मिलेगा दम, बदलेगा ताकत का संतुलन

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नई दिल्ली: भारत नौसेना के लिए प्रोजेक्ट-75I को एक बड़ा और अहम कदम माना जा रहा है. यह परियोजना भारत की समुद्री ताकत को मजबूत करने और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलते सुरक्षा हालात के बीच रणनीतिक बढ़त हासिल करने की दिशा में अहम मानी जा रही है. प्रोजेक्ट-75I पर बातचीत सितंबर 2025 में तेज हुई थी और आने वाले महीनों में इसके अंतिम रूप लेने की जल्द उम्मीद है.

इस परियोजना के तहत भारत 6 अत्याधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियां शामिल करेगा. इन पनडुब्बियों में एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी AIP तकनीक होगी, जिससे ये लंबे समय तक बिना सतह पर आए पानी के नीचे रह सकेंगी. इससे इनकी स्टेल्थ यानी छिपकर काम करने की क्षमता काफी बढ़ जाएगी.

सूत्रों के मुताबिक, इस रेस में जर्मनी की टाइप-214NG पनडुब्बी को स्पेन की S-80 प्लस पर प्राथमिकता दी गई है. इसकी सबसे बड़ी वजह इसका परखा हुआ फ्यूल-सेल आधारित AIP सिस्टम, बेहतर साइलेंस तकनीक और कम तकनीकी जोखिम बताया जा रहा है. क्योंकि इसकी समंदर के नीचे जंग में भरोसेमंद तकनीक और कम शोर सबसे अहम हैं.

प्रोजेक्ट-75I के तहत ये सभी 6 पनडुब्बियां भारत में ही बनाई जाएंगी. निर्माण का काम मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड यानी MDL में होगा, जबकि जर्मनी की कंपनी थायसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स तकनीकी मदद और डिजाइन उपलब्ध कराएगी. शुरुआत में इन पनडुब्बियों में करीब 45 फीसदी स्वदेशी सामग्री होगी, जिसे आखिरी पनडुब्बी तक बढ़ाकर लगभग 60 फीसदी करने का लक्ष्य है.

सरकार का साफ कहना है कि यह सिर्फ पनडुब्बी खरीदने का प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि तकनीक हासिल करने और देश में पनडुब्बी निर्माण की मजबूत क्षमता खड़ी करने की कोशिश है. इससे भविष्य में भारत पूरी तरह स्वदेशी पनडुब्बियां बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकेगा.

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