ईरान परमाणु समझौते में पाकिस्तान को गारंटर बनाने की तैयारी, अमेरिका की रणनीति पर उठे सवाल

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नई दिल्ली: ईरान और अमेरिका के बीच संभावित परमाणु समझौते को लेकर एक बड़ा कूटनीतिक मोड़ सामने आया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस डील में पाकिस्तान को गारंटर देश के रूप में शामिल करने की तैयारी चल रही है, यानी भविष्य में होने वाले समझौते पर ईरान और अमेरिका के साथ पाकिस्तान भी हस्ताक्षरकर्ता होगा। बताया जा रहा है कि इस प्रस्ताव को लेकर कतर और अमेरिका समेत कई पक्षों के बीच सहमति बन चुकी है और फिलहाल इसका फाइनल ड्राफ्ट तैयार किया जा रहा है।

पाकिस्तान को गारंटर बनाने पर क्यों बनी सहमति?
सूत्रों के अनुसार ईरान ने किसी भी परमाणु समझौते से पहले एक भरोसेमंद गारंटर की मांग रखी थी। उसका तर्क है कि अमेरिका के साथ पहले हुए समझौतों का पूरी तरह पालन नहीं हुआ, इसलिए इस बार किसी तीसरे पक्ष की गारंटी जरूरी है। इसी पृष्ठभूमि में पाकिस्तान का नाम सामने आया है, जो ईरान का पड़ोसी देश है और दोनों के बीच लगभग 909 किलोमीटर लंबी सीमा साझा होती है।

दो चरणों में हो सकता है शांति समझौता
जानकारी के मुताबिक ईरान और अमेरिका के बीच संभावित समझौता दो चरणों में हो सकता है। पहले चरण में एक अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर किए जाएंगे, जिसके बाद 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौता किए जाने की योजना है। इस प्रक्रिया में पाकिस्तान की भूमिका एक निगरानी और गारंटर देश के रूप में देखी जा रही है।

अमेरिकी रणनीति में पाकिस्तान की भूमिका पर चर्चा
विश्लेषकों के अनुसार पाकिस्तान को इस प्रक्रिया में शामिल करने के पीछे अमेरिका की कई रणनीतिक वजहें बताई जा रही हैं। सबसे अहम कारण यह माना जा रहा है कि पाकिस्तान ईरान का पड़ोसी देश होने के कारण वहां के हालात पर सीधी नजर रख सकता है। इससे ईरान के किसी भी संभावित परमाणु गतिविधि पर तत्काल जानकारी मिल सकती है।

मुस्लिम देशों में भरोसा बनाने की कोशिश
एक अन्य पहलू यह भी बताया जा रहा है कि अमेरिका पाकिस्तान को आगे करके मध्य-पूर्व के मुस्लिम देशों, जैसे सऊदी अरब, तुर्की और कतर के साथ भरोसे का माहौल बनाना चाहता है। पाकिस्तान पहले से ही कई देशों के साथ रक्षा और कूटनीतिक संबंध साझा करता है, जिससे उसे एक मध्यस्थ भूमिका में देखा जा रहा है।

चीन और रूस की भूमिका से दूरी बनाने की रणनीति
विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिका की रणनीति में यह भी शामिल है कि यदि गारंटर के रूप में चीन या रूस जैसे देश आते हैं, तो समझौते के बाद किसी भी संभावित सैन्य कार्रवाई की संभावना सीमित हो सकती है। ऐसे में पाकिस्तान को शामिल करने से अमेरिका के लिए रणनीतिक लचीलापन बना रहेगा।

पाकिस्तान-ईरान सीमा और खुफिया नजरिया
पाकिस्तान और ईरान के बीच लंबी सीमा होने के कारण सुरक्षा और खुफिया दृष्टिकोण से भी पाकिस्तान की भूमिका अहम मानी जा रही है। कहा जा रहा है कि यदि ईरान किसी तरह अपने परमाणु कार्यक्रम को फिर से सक्रिय करता है, तो पाकिस्तान के जरिए उस पर नजर रखना आसान हो सकता है। ऐतिहासिक संदर्भ में भी दोनों देशों के बीच परमाणु जानकारी से जुड़े आरोप और चर्चाएं पहले सामने आ चुकी हैं।

कूटनीतिक हलचल के बीच बढ़ी वैश्विक निगरानी
फिलहाल ईरान और अमेरिका के बीच जारी वार्ता और संभावित समझौते को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। पाकिस्तान की संभावित भूमिका इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक जटिल और रणनीतिक बना रही है।

 

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