नीदरलैंड के शोधार्थी ने भागलपुर में अपनाई मिट्टी की जीवनशैली, प्राकृतिक उपचार पद्धति को जानने पहुंचे विदेशी युवा

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नीदरलैंड से आए 25 वर्षीय शोधार्थी फ्लोरिस द राउटर इन दिनों भागलपुर स्थित तपोवर्धन प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र में रहकर भारतीय प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति को करीब से समझ रहे हैं। लीडेन विश्वविद्यालय से जुड़े फ्लोरिस को इंटरनेट मीडिया के जरिए इस केंद्र की जानकारी मिली थी, जिसके बाद उन्होंने यहां आकर उपचार प्रणाली का प्रत्यक्ष अध्ययन करने का निर्णय लिया।

मिट्टी की झोपड़ी में रहकर सीख रहे उपचार विधियां
फ्लोरिस विशेष रूप से उस पद्धति को देखने पहुंचे हैं जिसमें मरीजों को मिट्टी, पुआल, लकड़ी के बुरादे और गोबर से बनी झोपड़ियों में रखकर उपचार किया जाता है। केंद्र में कैंसर, मधुमेह, किडनी, थायराइड, दमा, त्वचा रोग और एनीमिया सहित कई गंभीर बीमारियों के प्राकृतिक उपचार का दावा किया जाता है। उपचार प्रक्रियाओं में मिट्टी पट्टी, ठंडे-गर्म पानी से स्नान, कीचड़ स्नान, नियंत्रित उपवास और फल-सब्जी आधारित आहार शामिल हैं।

तीन दिन से ‘मड हट’ में प्रवास, अनुभव दर्ज कर रहे शोधार्थी
पिछले तीन दिनों से फ्लोरिस केंद्र की मिट्टी से बनी कुटिया में रह रहे हैं। उनका कहना है कि प्राकृतिक वातावरण में रहने से उन्हें असुविधा नहीं बल्कि मानसिक शांति और लेखन-चिंतन का अवसर मिला है। वे यहां के अनुभवों को अपनी डायरी में विस्तार से दर्ज कर रहे हैं और प्राकृतिक जीवनशैली को समझने का प्रयास कर रहे हैं।

केंद्र निदेशक ने समझाया शरीर का प्राकृतिक तंत्र
केंद्र के निदेशक जेता सिंह ने उन्हें बताया कि शरीर के भीतर पोषक तत्वों के संचरण के लिए एक व्यवस्थित प्राकृतिक तंत्र काम करता है। यदि शरीर में हानिकारक तत्व लंबे समय तक बने रहें तो श्वसन, उदर, त्वचा और मानसिक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं, जो समय रहते नियंत्रित न की जाएं तो गंभीर रोगों में बदल सकती हैं।

डिटॉक्स प्रक्रिया ने किया प्रभावित
फ्लोरिस ने शरीर शुद्धि यानी डिटॉक्स से जुड़ी प्रक्रियाओं का भी अवलोकन किया। विशेष रूप से साधारण एनिमा विधि से उदर शुद्धि की प्रक्रिया ने उन्हें प्रभावित किया। उनका मानना है कि प्राकृतिक चिकित्सा शरीर को उसकी मूल अवस्था में लौटाने का प्रयास करती है और इसमें दवाओं के बजाय प्रकृति के तत्वों का उपयोग होता है।

सरकारी पहल से विदेशियों तक पहुंचा केंद्र
बताया जाता है कि इस केंद्र की स्थापना के पीछे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की यह परिकल्पना थी कि यहां विदेशों से भी लोग आकर प्राकृतिक चिकित्सा का लाभ लें। निर्माण कार्य में सरकार की ओर से अनुदान भी दिया गया था और पहली बार किसी विदेशी शोधार्थी का यहां प्रवास इस पहल को साकार करता दिख रहा है।

परिजनों और मित्रों को भी बुलाया
यहां के वातावरण और सादगीपूर्ण जीवनशैली से प्रभावित फ्लोरिस ने अपनी बहन सरलोते और मित्र बर्ट को भी आमंत्रित किया है, जो रविवार शाम तक भागलपुर पहुंचकर डिटॉक्स थेरेपी और प्राकृतिक आहार पद्धति का अनुभव करेंगे। फ्लोरिस 18 तारीख को वापस लौट जाएंगे।

 

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