नई दिल्ली: ज्योतिष शास्त्र में भगवान शनि को न्याय के देवता के रूप में जाना जाता है, लेकिन आम जनमानस में उनकी छवि एक क्रूर और दंड देने वाले देव के रूप में बनी हुई है. यही वजह है कि लोग शनि की दृष्टि से बचने और उनकी कृपा पाने के लिए पूजा-पाठ, दान और विशेष उपाय करते रहते हैं. हिंदू धर्म और ज्योतिष शास्त्र में शनि दोष और साढ़ेसाती से मुक्ति के लिए कई धार्मिक उपाय बताए गए हैं, जिनमें हनुमान आराधना से लेकर पीपल के वृक्ष के नीचे दीपक जलाने तक की परंपरा शामिल है.
इन लोगों पर नहीं पड़ता शनि का अशुभ प्रभाव
धर्मग्रंथों और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार कुछ ऐसे भक्त और आस्थाएं हैं, जिन पर शनि देव की कुदृष्टि कभी नहीं पड़ती. मान्यता है कि ये लोग उन शक्तियों से जुड़े होते हैं, जिनसे स्वयं शनिदेव भी भय खाते हैं. यही कारण है कि शनि ऐसे भक्तों की ओर आंख उठाकर देखने से भी परहेज करते हैं.
चार ऐसी शक्तियां जिनसे शनि देव भी खाते हैं खौफ
पौराणिक कथाओं में भले ही शनि देव की दृष्टि से बड़े-बड़े देवता भी प्रभावित हुए हों, लेकिन धर्म शास्त्रों में चार ऐसी शक्तियों का उल्लेख मिलता है, जिनके सामने शनि देव की भी एक नहीं चलती.
भगवान हनुमान
मान्यता है कि भगवान हनुमान के परम भक्तों पर शनि देव कभी अशुभ प्रभाव नहीं डालते. यहां तक कि यदि किसी की कुंडली में शनि कमजोर या अशुभ स्थिति में हों, तो हनुमान जी की आराधना से शनि शुभ फल देने लगते हैं. पौराणिक कथा के अनुसार रावण की कैद से शनिदेव को मुक्त कराने वाले हनुमान जी ही थे. इसी उपकार के कारण शनिदेव हनुमान भक्तों पर सदैव कृपा बनाए रखते हैं.
पीपल का वृक्ष
शनि दोष शांति के लिए पीपल से जुड़े उपायों का विशेष महत्व बताया गया है. कथा के अनुसार ऋषि पिप्लाद के माता-पिता का देहांत बचपन में ही हो गया था. बाद में उन्हें ज्ञात हुआ कि यह सब शनि की महादशा का प्रभाव था. इससे क्रोधित होकर पिप्लाद ने पीपल के वृक्ष के नीचे कठोर तप किया और ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त किया. कथा के अनुसार उन्होंने ब्रह्मदंड से पीपल वृक्ष में विराजमान शनिदेव पर प्रहार किया, जिससे शनि के पैर टूट गए. तभी से शनिदेव पीपल के वृक्ष और ऋषि पिप्लाद से भय खाने लगे.
भगवान शिव
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक बार भगवान शिव और शनि देव के बीच युद्ध हुआ था. इस दौरान शनिदेव ने शिव पर अपनी मारक दृष्टि डाली, जिससे शिव को भी कष्ट हुआ. इसके प्रत्युत्तर में भगवान शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोलकर शनि देव को गंभीर आघात पहुंचाया. इस घटना के बाद से शनिदेव भगवान शिव से भयभीत रहने लगे.
पत्नी चित्ररथ
कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि शनिदेव अपनी पत्नी चित्ररथ से भी भय खाते हैं. मान्यता है कि एक बार चित्ररथ संतान प्राप्ति की इच्छा लेकर शनि के पास गईं, लेकिन श्रीकृष्ण भक्ति में लीन शनि ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया. इससे क्रोधित होकर चित्ररथ ने उन्हें श्राप दे दिया, जिसके प्रभाव से शनि की दृष्टि टेढ़ी हो गई. तभी से शनिदेव अपनी पत्नी से भी भय मानते हैं.