नई दिल्ली: पिछले कुछ महीनों में चांदी की कीमतों ने ऐसा उछाल देखा है, जिसने निवेशकों से लेकर आम लोगों तक को चौंका दिया है। 29 दिसंबर को जहां चांदी 2.50 लाख रुपये प्रति किलो थी, वहीं महज एक महीने के भीतर यह रिकॉर्ड 4 लाख रुपये प्रति किलो के पार पहुंच गई है। जनवरी 2026 के दौरान चांदी की कीमतों में करीब 60 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई है, जबकि बीते एक साल में इसमें लगभग 280 प्रतिशत का उछाल देखने को मिला है।
जनवरी की 16 तारीख तक चांदी में करीब 30 प्रतिशत की बढ़त हो चुकी थी। इससे एक दिन पहले कीमतों में अचानक 15 हजार रुपये का उछाल आया था और चांदी करीब 3 लाख रुपये प्रति किलो के स्तर पर पहुंच गई थी। इसके बाद महज दो हफ्तों में गुरुवार 29 जनवरी 2026 को चांदी ने 4 लाख रुपये प्रति किलो का रिकॉर्ड स्तर छू लिया।
MCX पर रिकॉर्ड तेजी, एक दिन में हजारों रुपये का उछाल
बुधवार 28 जनवरी को मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज यानी MCX पर चांदी 2.4 प्रतिशत की बढ़त के साथ 3,64,821 रुपये प्रति किलो पर खुली और कारोबार के दौरान 3,83,100 रुपये प्रति किलो के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई। यानी एक ही दिन में चांदी की कीमत में 18,279 रुपये का इजाफा दर्ज किया गया। अगले ही दिन तेजी और तेज हो गई और MCX पर चांदी की कीमत करीब 10 प्रतिशत से अधिक उछलकर 4.27 लाख रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई।
क्यों लगातार बढ़ रही हैं चांदी की कीमतें
चांदी की कीमतों में लगातार जारी इस तेजी के पीछे कई तात्कालिक और दीर्घकालिक कारण बताए जा रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक आर्थिक अनिश्चितता, बढ़ता अमेरिकी कर्ज और भू-राजनीतिक तनाव इसकी प्रमुख वजहों में शामिल हैं। इसके साथ ही दुनिया भर के सेंट्रल बैंक सोने की खरीद बढ़ा रहे हैं और अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कोई बदलाव न किए जाने से डॉलर कमजोर हुआ है, जिसका असर कीमती धातुओं की कीमतों पर पड़ा है।
इसके अलावा चांदी की सप्लाई में कमी और मांग में तेज बढ़ोतरी ने भी कीमतों को ऊपर धकेला है। मांग और आपूर्ति के नियमों के मुताबिक जब सप्लाई सीमित रहती है और मांग बढ़ती है, तो कीमतों में तेजी आना स्वाभाविक है। बढ़ती कीमतों के कारण निवेश के तौर पर भी चांदी की मांग में इजाफा देखा जा रहा है।
निवेश से आगे बढ़कर औद्योगिक धातु बनी चांदी
जानकारों का कहना है कि अब चांदी सिर्फ निवेश या आभूषण तक सीमित नहीं रही है। आधुनिक तकनीक और उद्योगों में इसके बढ़ते इस्तेमाल ने इसकी मांग को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। स्मार्टफोन, सोलर पैनल, इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक वाहन और अन्य आधुनिक तकनीकों में चांदी की जरूरत तेजी से बढ़ी है, जबकि सप्लाई उसी अनुपात में नहीं बढ़ पाई है।
भारत में चांदी का पारंपरिक इस्तेमाल गहनों और सिक्कों के रूप में लंबे समय से होता रहा है। शादियों, त्योहारों और खास मौकों पर चांदी की मांग हमेशा से मजबूत रही है, लेकिन अब औद्योगिक मांग की हिस्सेदारी भी लगातार बढ़ रही है।
सोलर पैनल में तेजी से बढ़ रही चांदी की खपत
अमेरिका स्थित गैर-लाभकारी संस्था ‘द सिल्वर इंस्टीट्यूट’ के मुताबिक चांदी का सबसे तेजी से बढ़ता उपयोग सोलर पैनलों में हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार 2024 में फोटोवोल्टिक सिल्वर की मांग कुल चांदी खपत का 29 प्रतिशत थी, जबकि इससे पहले यह केवल 11 प्रतिशत थी। एक औसत सोलर पैनल में करीब 15 से 20 ग्राम चांदी का इस्तेमाल होता है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी और इंटरनेशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी की 2025-26 रिपोर्ट के मुताबिक भारत में सौर ऊर्जा उत्पादन 2014 में 2.6 गीगावाट से बढ़कर 2020 में 35 गीगावाट और 2024 में 85 गीगावाट तक पहुंच चुका है। 2026 में इसके 100 गीगावाट से अधिक होने की उम्मीद है। सौर ऊर्जा के इस विस्तार का सीधा असर चांदी की मांग पर पड़ रहा है।
मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में बढ़ती जरूरत
स्मार्टफोन, टैबलेट, लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में भी चांदी का व्यापक इस्तेमाल होता है। प्रिंटेड सर्किट बोर्ड, सेंसर, स्विच, कनेक्टर और RFID एंटेना में इसकी जरूरत पड़ती है। चांदी की अल्ट्रा-लो रेजिस्टिव नेचर और लंबी उम्र इसे इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए बेहद जरूरी बनाती है। हर साल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ चांदी की खपत भी उसी अनुपात में बढ़ रही है।
इलेक्ट्रिक वाहनों में भी बढ़ रही चांदी की मांग
इलेक्ट्रिक वाहनों में बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स, इन्वर्टर, वायरिंग, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और सेंसर में चांदी का इस्तेमाल किया जाता है। सिल्वर इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के मुताबिक पारंपरिक इंटरनल कंबशन इंजन वाहनों की तुलना में इलेक्ट्रिक वाहनों में चांदी की खपत 67 से 79 प्रतिशत तक अधिक होती है।
भारत में आयात पर निर्भरता भी बढ़ी
भारत चांदी का बड़ा उत्पादक देश नहीं है और घरेलू मांग का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा किया जाता है। द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार 2025 में भारत ने करीब 9.2 बिलियन डॉलर यानी 75 हजार करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की चांदी का आयात किया, जो 2024 के मुकाबले 44 प्रतिशत ज्यादा है। वर्ल्ड इंटिग्रेटेड ट्रेड सॉल्यूशन के मुताबिक भारत ने चांदी सबसे ज्यादा चीन, यूनाइटेड किंगडम, यूएई, हॉन्ग कॉन्ग और रूस से खरीदी है।
सप्लाई सीमित, इसलिए कीमतों पर दबाव
यूएस जियोलॉजिकल सर्वे के मुताबिक चांदी का बड़ा हिस्सा तांबा, जिंक, लेड और सोने की खानों से बायप्रोडक्ट के रूप में निकलता है। इसका मतलब यह है कि मांग बढ़ने के बावजूद इसकी सप्लाई को तेजी से नहीं बढ़ाया जा सकता। वैश्विक सप्लाई स्थिर रहने और भारत जैसे देशों में मांग बढ़ने से कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं।
क्या आगे गिरेंगी चांदी की कीमतें
बढ़ती कीमतों के बीच निवेशकों को रिच डैड पुअर डैड के लेखक रॉबर्ट कियोसाकी ने सतर्क रहने की सलाह दी है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा है कि चांदी की कीमतें अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच सकती हैं और आगे लंबी अवधि में तेजी जारी रहने से पहले गिरावट भी देखने को मिल सकती है। उनका कहना है कि बड़े पैमाने पर बिक्री से बाजार में करेक्शन या क्रैश की स्थिति भी बन सकती है।