यूपी भाजपा में बड़े बदलाव की आहट: पुराने चेहरों पर भरोसा या नए नेताओं पर दांव, अनुभव बनाम विजन पर मंथन तेज

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों हलचल तेज होती नजर आ रही है। प्रदेश में राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ रहा है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव जहां लगातार भाजपा पर हमलावर हैं, वहीं भाजपा संगठन के भीतर बड़े बदलावों को लेकर मंथन का दौर चल रहा है। पार्टी नई जिला, क्षेत्रीय और प्रदेश इकाइयों के गठन की तैयारी में जुटी है, साथ ही मंत्रिमंडल में संभावित फेरबदल को लेकर भी रणनीतिक चर्चा जारी है।

इसी के साथ निगम, बोर्ड, आयोग और विभिन्न समितियों में बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं के समायोजन को लेकर भी संगठन स्तर पर गंभीर विचार-विमर्श चल रहा है। भाजपा नेतृत्व संगठनात्मक संतुलन साधने के लिए कई स्तरों पर गणित बैठाने में लगा हुआ है।

गुजरात मॉडल पर यूपी में बदलाव की तैयारी

सूत्रों के अनुसार, गुजरात की तर्ज पर उत्तर प्रदेश भाजपा में भी प्रदेश और क्षेत्रीय इकाइयों में बड़े पैमाने पर बदलाव की संभावना जताई जा रही है। हालांकि पार्टी के भीतर इस बात को लेकर गहन मंथन जारी है कि आगामी चुनावों को देखते हुए नए चेहरों को मौका देना अधिक फायदेमंद होगा या अनुभवी नेताओं पर ही भरोसा बनाए रखना बेहतर रणनीति होगी।

इसके साथ ही एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी बना हुआ है कि मौजूदा प्रदेश पदाधिकारियों और क्षेत्रीय अध्यक्षों को बदलाव की स्थिति में किस तरह समायोजित किया जाएगा। अभी तक इसको लेकर कोई स्पष्ट फार्मूला सामने नहीं आया है।

लंबे समय से पदों पर बने कई पदाधिकारी

प्रदेश भाजपा संगठन में कई पदाधिकारी ऐसे हैं जो पिछले दस साल से अधिक समय से महत्वपूर्ण पदों पर बने हुए हैं। इनमें से कई नेता एमएलसी और विधायक होने के साथ-साथ संगठन की जिम्मेदारियां भी निभा रहे हैं। लेकिन अब पार्टी के भीतर नई पीढ़ी के नेताओं को आगे लाने की चर्चा तेज हो गई है।

बताया जा रहा है कि प्रदेश स्तर के कुछ पदाधिकारियों का प्रदर्शन तय मानकों के अनुरूप नहीं रहा है। ऐसे में संगठन में बदलाव की संभावना और मजबूत मानी जा रही है। प्रदेश संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह और प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी भी हाल के दिनों में प्रदेश इकाई में व्यापक बदलाव के संकेत दे चुके हैं।

पुराने नेताओं ने मांगी नई भूमिका

क्षेत्रीय अध्यक्षों में बदलाव की चर्चा के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि वर्तमान क्षेत्रीय अध्यक्षों को प्रदेश इकाई में जगह दी जाएगी या फिर उन्हें पार्टी के विभिन्न मोर्चों का प्रभार सौंपा जाएगा। संगठन से जुड़े सूत्रों के मुताबिक कई पुराने नेताओं ने पार्टी नेतृत्व के सामने अपने लिए नई जिम्मेदारी देने की मांग भी रखी है।

इससे पहले भी कई पूर्व क्षेत्रीय अध्यक्षों को विधान परिषद सदस्य बनाया गया था। हालांकि इस बार बदलाव की संभावना को लेकर कई नेताओं के बीच चिंता भी देखी जा रही है।

संगठन में क्षेत्रीय संतुलन भी बड़ी चुनौती

भाजपा की नई टीम बनाते समय क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखना भी पार्टी के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा है। वर्तमान में सात प्रदेश महामंत्रियों में पश्चिम क्षेत्र से कोई प्रतिनिधित्व नहीं है, जबकि अवध क्षेत्र से तीन नेता इस पद पर हैं।

वहीं 17 प्रदेश उपाध्यक्षों में से छह पश्चिम क्षेत्र से हैं और इनमें से तीन उपाध्यक्ष अकेले कानपुर से आते हैं। प्रदेश मंत्रियों में भी लखनऊ से तीन नाम हैं, जबकि आगरा, बुलंदशहर और वाराणसी से दो-दो नेताओं को जिम्मेदारी दी गई है।

ऐसे में नई प्रदेश टीम बनाते समय संगठन क्षेत्रीय समीकरणों को नए सिरे से संतुलित करने की कोशिश करेगा। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि भाजपा संगठन पुराने चेहरों की जगह नए विजन वाले कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी देता है या फिर अनुभव और संगठनात्मक पकड़ को देखते हुए कई पुराने नेताओं को एक बार फिर मैदान में उतारा जाता है।

 

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