नई दिल्ली : हिंदू धर्मग्रंथों में पिता को परिवार का आधार स्तंभ माना गया है. शास्त्रों में कहा गया है कि माता जन्म देती है तो पिता जीवन की दिशा देता है. गरुड़ पुराण (Garuda Purana)में पिता के सम्मान और पारिवारिक मर्यादा को लेकर स्पष्ट निर्देश मिलते हैं. इन नियमों का उद्देश्य केवल धार्मिक आस्था (religious faith)को बनाए रखना नहीं है बल्कि परिवार में अनुशासन संतुलन और आदर की भावना को स्थिर रखना भी है. जब तक पिता जीवित हों तब तक पुत्र को कुछ सीमाओं का पालन करना चाहिए ताकि परिवार में पदक्रम और परंपरा सुरक्षित रह सके.
गरुड़ पुराण के अनुसार पिता घर के स्वाभाविक मुखिया होते हैं. ऐसे में जब तक वे जीवित हों घर के प्रमुख निर्णय और धार्मिक अनुष्ठानों की अगुवाई उन्हीं के हाथ में रहनी चाहिए. पुत्र का कर्तव्य है कि वह सहयोगी की भूमिका निभाए और अपने अनुभव तथा ऊर्जा से पिता का साथ दे. यदि पुत्र नेतृत्व की भूमिका स्वयं संभाल ले तो इससे परिवार में असंतुलन की स्थिति बन सकती है. इसलिए शास्त्रों ने स्पष्ट किया है कि अधिकार से पहले कर्तव्य को समझना आवश्यक है.
इसी प्रकार पितृकर्म को लेकर भी विशेष व्यवस्था बताई गई है. पूर्वजों के तर्पण और पिंडदान का पहला अधिकार पिता को माना गया है. जब तक पिता जीवित हैं तब तक पुत्र को स्वयं यह कर्म नहीं करना चाहिए. इसका मूल भाव यह है कि हर पीढ़ी अपने पूर्वजों से सीधे जुड़ी होती है और उस क्रम का सम्मान करना ही धर्म है. यह परंपरा परिवार की जड़ों को मजबूत करने का प्रतीक मानी गई है.
दान पुण्य के विषय में भी गरुड़ पुराण मार्गदर्शन देता है. यदि पुत्र कोई दान करता है तो उसे पिता का नाम प्राथमिक रूप से आगे रखना चाहिए. यह केवल औपचारिकता नहीं बल्कि यह संदेश है कि पुत्र की पहचान उसके पिता से जुड़ी है. इससे परिवार की प्रतिष्ठा बनी रहती है और समाज में बड़ों का सम्मान स्थापित होता है.
सामाजिक आयोजनों और सार्वजनिक मंचों पर भी नाम के क्रम को महत्व दिया गया है. निमंत्रण पत्र हो या कोई पारिवारिक समारोह पिता का नाम पहले और पुत्र का बाद में लिखा जाना शिष्टाचार माना गया है. यह छोटा सा व्यवहारिक नियम है परंतु इसके पीछे गहरा सांस्कृतिक अर्थ छिपा है. इससे यह दर्शाया जाता है कि परिवार में वरिष्ठ का स्थान सर्वोपरि है और कनिष्ठ उसका सम्मान करता है.
कुछ पारंपरिक प्रतीकों को लेकर भी मान्यताएं प्रचलित रही हैं. पुराने समय में मूंछ को वंश की गरिमा और सम्मान का प्रतीक माना जाता था. ऐसी मान्यता थी कि पिता के रहते पुत्र को इसे नहीं कटवाना चाहिए. यद्यपि आधुनिक समय में इन प्रतीकों का स्वरूप बदल गया है परंतु इनका मूल भाव आज भी प्रासंगिक है. संदेश यही है कि पिता का स्थान सर्वोच्च है और उनके रहते पुत्र को मर्यादा में रहकर जीवन जीना चाहिए.
गरुड़ पुराण के ये नियम कठोर बंधन नहीं बल्कि पारिवारिक संतुलन बनाए रखने के सूत्र हैं. जब पुत्र पिता का सम्मान करता है तो परिवार में प्रेम विश्वास और स्थिरता बनी रहती है. यही शास्त्रों का सार है कि सम्मान से ही संबंध मजबूत होते हैं और मर्यादा से ही परिवार की नींव सुरक्षित रहती है.