‘विदेश नहीं, पंजाब में ही भविष्य’: 18 साल की उम्र में हर महीने 5–6 लाख कमाता है यह नौजवान, पढ़ाई छोड़ भैंसों से रच रहा सफलता की कहानी

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जहां ज्यादातर किशोर अभी करियर की दिशा तय करने में लगे होते हैं, वहीं पंजाब के बरनाला जिले के सेहना गांव का 18 साल का सोहलप्रीत सिंह सिद्धू कम उम्र में ही एक मजबूत और स्पष्ट रोडमैप तैयार कर चुका है। इस जनवरी में 18 साल पूरे करने वाले सोहलप्रीत न तो IELTS की कोचिंग कर रहे हैं, न ही विदेश में पढ़ाई के लिए यूनिवर्सिटी एप्लिकेशन या एजुकेशन लोन की तैयारी में जुटे हैं। उनका फोकस पूरी तरह अपने डेयरी बिजनेस पर है, जिससे वह हर महीने 5 से 6 लाख रुपये की कमाई कर रहे हैं।

बरनाला के सेहना गांव निवासी सोहलप्रीत, 41 वर्षीय बलबीर सिंह सिद्धू के इकलौते बेटे हैं। उन्होंने माइग्रेशन के ट्रेंड से हटकर ग्रामीण पंजाब में आधुनिक और बड़े पैमाने पर डेयरी फार्मिंग को अपना करियर चुना है। ओपन स्कूलिंग से 12वीं पास करने वाले सोहलप्रीत आने वाले शैक्षणिक सत्र में वेटेरिनरी कोर्स में दाखिला लेने की योजना बना रहे हैं। उनका मानना है कि विदेश जाना नहीं, बल्कि प्रैक्टिकल नॉलेज और जमीन से जुड़ा अनुभव ही उनके भविष्य की नींव है।

15 साल की उम्र में रखा पहला कदम

सोहलप्रीत का यह सफर 15 साल की उम्र में शुरू हुआ, जब उन्होंने परिवार को पहली भैंस खरीदने के लिए राजी किया। उस समय घर में पहले से चार से पांच भैंसों की छोटी डेयरी थी। अगस्त 2023 में 1.20 लाख रुपये में पहली भैंस खरीदी गई, जिसमें परिवार ने निवेश किया। घर पर मौजूद मवेशियों की जिम्मेदारी धीरे-धीरे पूरी तरह सोहलप्रीत ने संभाल ली और पहले साल की पूरी कमाई को नए मवेशी खरीदने में फिर से निवेश कर दिया।

सोहलप्रीत बताते हैं कि उन्हें बचपन से ही डेयरी फार्मिंग में गहरी दिलचस्पी रही है। परिवार हमेशा घरेलू जरूरतों के लिए पशुपालन करता रहा, और यहीं से उनका झुकाव इस काम की ओर बढ़ता गया।

120 से ज्यादा जानवरों का मजबूत झुंड

आज महज तीन साल के भीतर सोहलप्रीत के फार्म पर करीब 120 जानवर हैं। इनमें लगभग 55 भैंसें, 15 गायें और करीब 50 छोटे मवेशी व बछड़े शामिल हैं। झुंड में 53 मुर्रा भैंसें, दो नीली रावी भैंसें, 12 होलस्टीन फ्रीजियन गायें, दो जर्सी गायें और एक साहीवाल जैसी प्रीमियम नस्लें मौजूद हैं। ये सभी दुधारू पशु हैं। सोहलप्रीत का अनुमान है कि अगले साल कई भैंसों के बछड़े होंगे और तब तक करीब 100 भैंसें दूध देने लगेंगी। उनका सपना है कि भविष्य में एक समय पर 500 से 550 भैंसें दूध देने वाली हों।

कैश फ्लो बनाए रखने की रणनीति

फिलहाल फार्म पर किसी भी समय 50 से 55 भैंसें दूध दे रही होती हैं, जिनमें से 15 से 20 पहले से गर्भवती रहती हैं। सोहलप्रीत अपनी कमाई से जल्द ही 30 और भैंसें खरीदने की योजना बना रहे हैं। उनका फोकस इस बात पर है कि प्रेग्नेंट और दुधारू भैंसों का संतुलन बना रहे, ताकि पूरे साल कैश फ्लो स्थिर बना रहे।

‘विदेश भेजने पर पैसा मत खर्च करो’

जहां कई परिवार अपने बच्चों को विदेश भेजने का सपना देखते हैं, वहीं सोहलप्रीत ने शुरुआत में ही अपनी बात साफ कर दी थी। उन्होंने माता-पिता से कहा कि विदेश भेजने पर पैसा खर्च करने के बजाय उसी रकम को उनके बिजनेस में निवेश किया जाए। उनके पिता बलबीर सिंह सिद्धू बताते हैं कि शुरुआत में परिवार पूरी तरह आश्वस्त नहीं था, लेकिन बेटे के पैशन और मेहनत ने सबको मना लिया। आज पूरा परिवार उस पर गर्व करता है। दादा निशान सिंह सिद्धू भी सोहलप्रीत की तरक्की को पूरे परिवार के लिए गर्व और खुशी का विषय बताते हैं।

हर दिन 650–700 लीटर दूध का उत्पादन

फार्म से रोजाना 650 से 700 लीटर दूध का उत्पादन होता है, जिसे बरनाला स्थित एक निजी कंपनी के कलेक्शन सेंटर को बेचा जाता है। भैंस का दूध 65 से 70 रुपये प्रति किलो और गाय का दूध 38 से 42 रुपये प्रति किलो की दर से बिकता है। कुल उत्पादन में करीब 400 किलो भैंस का दूध होता है, बाकी गाय का। महीने की दूध बिक्री करीब 10 लाख रुपये तक पहुंच जाती है, जिसमें से लगभग 60 प्रतिशत मुनाफा रहता है।

मेहनत, मशीन और मैनेजमेंट

छह मजदूरों की मदद से फार्म का काम चलता है, लेकिन हाथ और मशीन से दूध निकालना अब भी चुनौतीपूर्ण है। अकेले दूध दुहने में रोज करीब तीन घंटे लग जाते हैं। इसके बावजूद सोहलप्रीत मानते हैं कि आर्थिक गणित पूरी तरह उनके पक्ष में है। खर्च का बड़ा हिस्सा चारा, फीड और मजदूरी पर आता है। सही मैनेजमेंट होने पर दवाइयों का खर्च काफी कम रहता है।

घर में उगाए गए चारे की वजह से मुनाफा करीब 60 प्रतिशत बना रहता है, जिससे हर साल 25 से 30 नए जानवर जोड़ पाना संभव हो पाता है।

42 एकड़ जमीन और साइंटिफिक प्लानिंग

परिवार के पास करीब 20 एकड़ खुद की जमीन है और 22 एकड़ जमीन लीज पर ली गई है। इसमें से एक एकड़ में डेयरी फार्म फैला है, जिसे हर साल वैज्ञानिक योजना के तहत बढ़ाया जा रहा है। अलग फीडिंग एरिया, बेहतर शेड और भैंसों के लिए पानी का पूल तैयार किया गया है। बाकी जमीन पर गेहूं, धान, मक्का और चारे की फसलें उगाई जाती हैं। करीब 4.5 एकड़ जमीन सालभर केवल चारे के उत्पादन के लिए आरक्षित है।

बरसीन, जौ, मक्का, चरी और बाजरा जैसी फसलें मौसम के हिसाब से उगाई जाती हैं। साइलेज भी फार्म पर ही तैयार किया जाता है।

डिग्री और अनुभव का कॉम्बिनेशन

सोहलप्रीत मानते हैं कि अनुभव का कोई विकल्प नहीं है, लेकिन साथ ही औपचारिक पढ़ाई को भी जरूरी बताते हैं। यही वजह है कि वह वेटेरिनरी डिग्री लेने की योजना बना रहे हैं। उनका कहना है कि बड़े स्तर पर काम करने के लिए ज्ञान जरूरी है और प्रैक्टिकल अनुभव के साथ डिग्री का कॉम्बिनेशन इंसान को ज्यादा मजबूत बनाता है।

सोहलप्रीत बताते हैं कि पिछले तीन साल में उन्होंने दूध दुहने से लेकर पशुओं की देखभाल, चारा बनाने और बीमार होने पर इलाज तक हर काम खुद सीखा है। वह रोज सुबह 4:30 बजे उठते हैं, शेड की सफाई करते हैं और दूध निकालने से पहले हर जानवर की जांच करते हैं। उनका मानना है कि डेयरी बिजनेस में सिर्फ अच्छी नस्ल और अच्छा चारा ही नहीं, बल्कि सही मैनेजमेंट भी उतना ही जरूरी है।

गलतियों से सीखे सबक

शुरुआती दौर में कुछ गलत फैसले भी हुए। कुछ भैंसें ऐसी खरीदी गईं जो अच्छी ब्रीड की नहीं थीं, जिससे नुकसान हुआ। लेकिन सोहलप्रीत इसे सीख मानते हैं। उनका कहना है कि बिजनेस में हर काम खुद करना चाहिए, ताकि हर बारीकी समझ में आए और जरूरत के समय किसी पर निर्भर न रहना पड़े।

‘पंजाब और खेती में ही मौका देखा’

सोहलप्रीत के पिता बलबीर सिंह कहते हैं कि उन्हें खुशी है कि बेटे ने बॉर्डर के पार नहीं, बल्कि पंजाब और खेती में संभावनाएं देखीं। उनका मानना है कि अगर वैज्ञानिक तरीके से, बड़े पैमाने पर और बड़े लक्ष्य के साथ काम किया जाए, तो यहां भी विदेश से कम नहीं, बल्कि उससे ज्यादा हासिल किया जा सकता है।

सोहलप्रीत साफ शब्दों में कहते हैं कि डेयरी उनके लिए बोझ नहीं, बल्कि पैशन है। यही पैशन आज उनकी रोजी-रोटी बन चुका है और गांव की मिट्टी से गहराई से जुड़ा है। उनका कहना है, “मैं पंजाब नहीं छोड़ना चाहता। मेरा भविष्य यहीं है।”

 

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