अमेरिका से भारत लौटेंगी चोरी की तीन प्राचीन कांस्य मूर्तियां, स्मिथसोनियन म्यूजियम ने किया प्रत्यर्पण का ऐलान
नई दिल्ली। भारत की सांस्कृतिक धरोहर की एक अहम वापसी तय हो गई है। अमेरिका के वाशिंगटन स्थित स्मिथसोनियन नेशनल म्यूजियम ऑफ एशियन आर्ट ने तमिलनाडु के मंदिरों से चोरी कर विदेशों में पहुंचाई गई तीन बहुमूल्य कांस्य मूर्तियों को भारत सरकार को सौंपने का फैसला लिया है। इन प्रतिमाओं का संबंध चोल और विजयनगर काल से है और इन्हें दशकों पहले भारतीय कानूनों का उल्लंघन करते हुए बाहर भेजा गया था।
गहन जांच में सामने आई तस्करी की पूरी कहानी
संग्रहालय की ओर से की गई विस्तृत शोध और अभिलेखीय जांच में यह स्पष्ट हुआ कि ये मूर्तियां अवैध रूप से भारत से निकाली गई थीं। उत्पत्ति, स्वामित्व और लेन-देन के रिकॉर्ड की बारीकी से पड़ताल के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि इन्हें अंतरराष्ट्रीय कला बाजार में बेचा गया, जो भारतीय कानूनों का सीधा उल्लंघन है।
चोल और विजयनगर काल की बेजोड़ धरोहर
जिन मूर्तियों को लौटाया जा रहा है, उनमें चोल काल की लगभग 990 ईस्वी की ‘शिव नटराज’, 12वीं शताब्दी की ‘सोमस्कंद’ और 16वीं शताब्दी के विजयनगर काल की ‘संत सुंदरार विद परवई’ शामिल हैं। ये तीनों प्रतिमाएं दक्षिण भारतीय कांस्य कला की उत्कृष्ट मिसाल मानी जाती हैं।
शिव नटराज की कहानी दुनिया को दिखाएगा म्यूजियम
स्मिथसोनियन म्यूजियम ने न केवल इन प्रतिमाओं को भारत लौटाने की घोषणा की है, बल्कि ‘शिव नटराज’ की मूर्ति को दीर्घकालिक ऋण पर रखते हुए उसकी चोरी से लेकर वापसी तक की पूरी यात्रा को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने का निर्णय भी लिया है। यह प्रतिमा ‘दक्षिण एशिया, दक्षिणपूर्व एशिया और हिमालय में ज्ञान की कला’ नामक प्रदर्शनी का हिस्सा बनेगी।
1950 के दशक की तस्वीरों से हुआ खुलासा
साल 2023 में पांडिचेरी स्थित फ्रांसीसी संस्थान के फोटो अभिलेखागार के सहयोग से संग्रहालय के शोधकर्ताओं ने पुष्टि की कि इन कांस्य मूर्तियों की तस्वीरें 1956 से 1959 के बीच तमिलनाडु के मंदिरों में ली गई थीं। इन्हीं तस्वीरों ने मूर्तियों की असली पहचान और उत्पत्ति को प्रमाणित किया।
किस मंदिर से जुड़ी है कौन सी प्रतिमा
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय पुरातत्व विभाग ने इन निष्कर्षों की समीक्षा कर यह पुष्टि की कि मूर्तियों को अवैध रूप से हटाया गया था। संग्रहालय के निदेशक चेस एफ. रॉबिन्सन के अनुसार, ‘शिव नटराज’ की प्रतिमा तंजावुर जिले के श्री भाव औषधेश्वर मंदिर से संबंधित है, जहां 1957 में इसकी तस्वीर ली गई थी। बाद में वर्ष 2002 में न्यूयॉर्क की डोरिस वीनर गैलरी से इसे राष्ट्रीय एशियाई कला संग्रहालय ने हासिल किया।
जाली दस्तावेजों से हुई थी बिक्री
संग्रहालय के एक शोधकर्ता ने बताया कि डोरिस वीनर गैलरी ने प्रतिमा की बिक्री को आसान बनाने के लिए जाली दस्तावेजों का सहारा लिया था। ‘सोमस्कंद’ और ‘संत सुंदरार विद परवई’ की प्रतिमाएं करीब एक हजार वस्तुओं के उपहार का हिस्सा थीं। जांच में सामने आया कि ‘सोमस्कंद’ प्रतिमा मन्नारकुडी तालुक के अलत्तूर गांव स्थित विश्वनाथ मंदिर से संबंधित थी, जबकि शिव मंदिर में स्थापित ‘संत सुंदरार विद परवई’ की प्रतिमा कल्लकुरुच्ची तालुक के वीरसोलपुरम गांव से जुड़ी हुई थी।