वियतनाम और यूरोपीय संघ ने संबंधों को उच्चतम रणनीतिक साझेदारी स्तर तक बढ़ाया
ईयू को वियतनाम में अमेरिका, चीन और रूस के बराबर राजनयिक दर्जा; वैश्विक व्यापार और रणनीतिक सहयोग को मजबूती
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी ने भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते को भू-राजनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से अहम बताया है। उनके मुताबिक, यह समझौता वैश्विक व्यापार संतुलन में भारत और यूरोप की बढ़ती स्वतंत्रता को दर्शाता है और यह संकेत देता है कि दोनों क्षेत्र अब केवल अमेरिका-केंद्रित व्यापार मॉडल पर निर्भर नहीं रहना चाहते। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस समझौते को वास्तविक आर्थिक सफलता में बदलने के लिए भारत को उत्पादन क्षमता, लॉजिस्टिक्स और सप्लाई-चेन दक्षता में ठोस सुधार करने होंगे, वरना इसके लाभ सीमित रह सकते हैं।
अभिजीत बनर्जी ने कहा कि भारत जिन क्षेत्रों को लेकर मुक्त व्यापार समझौते से बड़ी उम्मीदें कर रहा है, वहां परिणाम समान नहीं रहेंगे। ज्वेलरी और चमड़ा जैसे उद्योगों में भारत की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत है, लेकिन टेक्सटाइल सेक्टर में उसे वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों से कड़ी चुनौती मिल रही है। उनके मुताबिक, असली बाधा उत्पादन क्षमता नहीं बल्कि आपूर्ति शृंखला की कमजोर कड़ियां और धीमी डिलीवरी प्रक्रिया है, जो वैश्विक बाजार में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त को सीमित कर रही है।
वियतनाम और यूरोपीय संघ (ईयू) ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को ऐतिहासिक रूप से मजबूत करते हुए इसे व्यापक रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक बढ़ा दिया है। यह उन्नयन वियतनाम का सर्वोच्च राजनयिक दर्जा माना जाता है, जिससे ईयू को अमेरिका, चीन और रूस के बराबर राजनयिक स्थिति प्राप्त हो गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम वैश्विक व्यापार और राजनयिक रणनीति में संतुलन बनाए रखने के प्रयासों का हिस्सा है, खासकर अमेरिकी शुल्क और व्यापारिक दबावों के बीच। यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा ने हनोई यात्रा के दौरान कहा कि यह साझेदारी केवल कूटनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक और रणनीतिक क्षेत्र में भी दोनों पक्षों को भरोसेमंद और विश्वसनीय सहयोग प्रदान करेगी।