18 फरवरी को जम्मू-कश्मीर में मौसम का अलर्ट, बारिश के आसार के बीच ग्लेशियर पिघलने से जल संकट की आशंका

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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में मौसम को लेकर अहम चेतावनी सामने आई है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने 18 फरवरी समेत आने वाले दिनों के लिए मौसम का पूर्वानुमान जारी किया है। विभाग के अनुसार, 25 फरवरी तक प्रदेश के अधिकतर हिस्सों में मौसम शुष्क बना रहेगा, हालांकि 23 फरवरी के आसपास एक कमजोर पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय हो सकता है, जिससे कुछ इलाकों में बारिश के आसार हैं।

IMD का पूर्वानुमान, तापमान में लगातार इजाफा
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, लंबे समय से बारिश और हिमपात न होने के कारण तापमान में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। मौसम विज्ञान केंद्र श्रीनगर के निदेशक मुख्तार अहमद ने बताया कि फिलहाल किसी बड़े पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने की संभावना नहीं है, जिससे मौसम में ठंडक लौटे।

ग्लेशियर पिघलने से नदियों में बढ़ेगा बहाव
मुख्तार अहमद के मुताबिक, ऊपरी इलाकों और ग्लेशियरों में समय से पहले बर्फ पिघलने से मार्च और अप्रैल के दौरान नदियों और नालों में पानी का प्रवाह अस्थायी रूप से बढ़ सकता है। हालांकि, गर्मी बढ़ने के साथ यह जलस्तर तेजी से घटने की आशंका है, खासकर यदि आने वाले समय में अच्छी बारिश नहीं होती।

सामान्य से काफी ऊपर पहुंचा तापमान
श्रीनगर में 15 फरवरी को अधिकतम तापमान 18 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो सामान्य से 7.6 डिग्री अधिक रहा। न्यूनतम तापमान भी माइनस 0.1 डिग्री सेल्सियस रहा, जो औसत से ऊपर था। कश्मीर, जम्मू और लद्दाख के मैदानी इलाकों में भी तापमान सामान्य से ज्यादा दर्ज किया गया, जहां अधिकतम तापमान 25 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया।

हिल स्टेशनों पर भी दिखा गर्मी का असर
गुलमर्ग, पहलगाम, सोनमर्ग, कोकरनाग, दकसुम और वेरीनाग जैसे पहाड़ी इलाकों के साथ-साथ गुरेज, तुलैल, जोजिला, वारवन और मरवा जैसे अत्यधिक ठंडे माने जाने वाले क्षेत्रों में भी तापमान में असामान्य वृद्धि देखी जा रही है।

चिल्लई खुराद के साथ सर्दी विदा होने की कगार पर
कश्मीर में शीत ऋतु का अंतिम चरण चिल्लई खुराद के साथ समाप्त होने वाला है, जो 30 जनवरी से 18 फरवरी तक रहता है। इसके बाद 10 दिनों का चिल्लई बच्चा आएगा, जो 28 फरवरी को खत्म होगा। इस बार फरवरी महीना भी भारी बारिश और हिमपात के बिना गुजर रहा है।

भूविज्ञानी की चेतावनी, गर्मियों में बढ़ेगा जल संकट
भूविज्ञानी रियाज अहमद मीर ने कहा कि सामान्य से कम हिमपात और बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर समय से पहले और तेजी से पिघल सकते हैं। इससे नदियों में अधिकतम जल प्रवाह वसंत ऋतु की शुरुआत में ही हो जाएगा, जबकि ग्रीष्म ऋतु के चरम समय में पानी की उपलब्धता घट सकती है। इसका सीधा असर सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और कृषि पर पड़ेगा।

खेती और पर्यावरण पर भी पड़ेगा असर
जलवायु विज्ञानी सोनम लोटस ने बताया कि नवंबर से फरवरी के बीच पश्चिमी हिमालय में भारी बर्फबारी हुई, लेकिन लगातार साफ मौसम के चलते तापमान तेजी से बढ़ रहा है। इससे ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का खतरा है। उन्होंने चेताया कि बादाम और सेब के पेड़ समय से पहले खिल सकते हैं, जिससे उत्पादन प्रभावित होगा।

दीर्घकालिक खतरे की आशंका
विशेषज्ञों का कहना है कि मार्च और अप्रैल में पिघले पानी से कुछ समय के लिए राहत मिल सकती है, लेकिन लंबे समय में जलस्रोत सूखने लगेंगे। खेती का मौसम शुरू होने पर पानी की कमी गंभीर समस्या बन सकती है।

 

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