पश्चिम बंगाल SIR मामला: सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, “एक चुनाव में वोट न दे पाने से खत्म नहीं होगा अधिकार”
पश्चिम बंगाल के एसआईआर मामले में सुप्रीम कोर्ट में बुधवार (01 अप्रैल 2026) को हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने मतदान अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हट जाने के कारण वह इस चुनाव में वोट नहीं दे पाता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसका मतदान का अधिकार हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा।
ट्रिब्यूनल के फैसले के बाद फिर जुड़ सकता है नाम
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर कोई व्यक्ति मतदाता सूची से बाहर किए जाने के खिलाफ ट्रिब्यूनल में अपील करता है और वहां से उसके पक्ष में फैसला आता है, तो उसका नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल किया जाएगा। यह व्यवस्था उन लोगों पर भी लागू होगी, जिन्हें पहले सूची में शामिल किया गया था लेकिन बाद में हटा दिया गया।
अगली सुनवाई 6 अप्रैल को
कोर्ट ने कहा कि लोगों को यह समझना जरूरी है कि एक चुनाव में वोट न दे पाने का मतलब स्थायी रूप से अधिकार से वंचित होना नहीं है। मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल को निर्धारित की गई है।
60 लाख आपत्तियों में से 47 लाख का निपटारा
इस दौरान कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी कि एसआईआर प्रक्रिया के तहत प्राप्त करीब 60 लाख आपत्तियों में से लगभग 47 लाख आपत्तियों का निपटारा 31 मार्च तक किया जा चुका है। उन्होंने बताया कि प्रतिदिन करीब 1.75 लाख से 2 लाख आपत्तियों पर विचार किया जा रहा है और 7 अप्रैल तक सभी मामलों के निपटारे का लक्ष्य रखा गया है।
“दो अहम पहलुओं पर नजर” – कोर्ट
मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि उन्हें हाईकोर्ट से प्राप्त तथ्यों और आंकड़ों से संतोष है। पीठ ने यह भी कहा कि जिस सॉफ्टवेयर में मतदाताओं का विवरण रखा जा रहा है, उसकी संरचना ऐसी है कि यह स्पष्ट करता है कि किसी व्यक्ति को सूची में शामिल या बाहर क्यों किया गया। कोर्ट ने जोर देते हुए कहा कि अपील की स्थिति में संबंधित व्यक्ति को कारण बताना अनिवार्य होना चाहिए। साथ ही पीठ ने स्पष्ट किया कि वह दो प्रमुख पहलुओं पर विशेष ध्यान दे रही है—पहला, चुनाव किस मतदाता सूची के आधार पर कराए जाएंगे और दूसरा, नागरिकों के मतदान के संवैधानिक अधिकार की सुरक्षा।