बरेली। ऑनलाइन गेमिंग की आभासी दुनिया एक खतरनाक जाल बनती जा रही है, जिसमें फंसकर मासूम जिंदगियां तबाह हो रही हैं। गाजियाबाद की दर्दनाक घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया है, जहां एक ऑनलाइन गेम के टास्क में उलझकर तीन सगी बहनों ने नौवीं मंजिल से कूदकर जान दे दी। कोरियन गेम और उसके दिए गए लक्ष्यों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर बच्चे इस दलदल में कैसे फंसते हैं और क्यों मौत जैसा खौफनाक कदम उठा लेते हैं। मामले की जांच जारी है, लेकिन ऑनलाइन गेम्स की लत ने अभिभावकों और समाज दोनों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या होता है ‘डिजिटल चक्रव्यूह’
मनोविज्ञान विशेषज्ञों के अनुसार, डिजिटल चक्रव्यूह उस मानसिक जाल को कहा जाता है जिसमें गेम्स को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि बच्चा धीरे-धीरे उनसे बाहर निकलने की क्षमता खो देता है। मंडलीय मनोविज्ञान केंद्र की प्रवक्ता याशिका वर्मा के मुताबिक, ऑनलाइन गेमिंग जितनी आकर्षक दिखती है, उतनी ही जटिल और खतरनाक भी हो सकती है। जहां शतरंज और पहेलियां दिमाग को तेज करती हैं, वहीं कई आधुनिक गेम्स बच्चों को मानसिक लत की ओर धकेल देते हैं।
दिमाग में कैसे पैदा होता है ‘केमिकल लोचा’
विशेषज्ञों का कहना है कि हर लेवल पूरा करने पर मिलने वाला रिवार्ड बच्चों के मस्तिष्क में डोपामिन रिलीज करता है। यह ‘फील-गुड’ हार्मोन उन्हें खुशी और उपलब्धि का अहसास कराता है। धीरे-धीरे बच्चा उसी खुशी का आदी हो जाता है और खेल में और गहराई तक फंसता चला जाता है।
जब डोपामिन बन जाता है खतरा
लगातार डोपामिन रिलीज होने से दिमाग उसकी आदत डाल लेता है। जब गेम नहीं मिलता, तो बच्चा उदासी, चिड़चिड़ापन और तनाव महसूस करता है। इस हार्मोनल असंतुलन का असर व्यवहार पर साफ दिखने लगता है और बच्चा अपनी खुशी को केवल डिजिटल दुनिया से जोड़ लेता है, जिससे वह वास्तविक जीवन से कटने लगता है।
ऑनलाइन गेमिंग का बच्चों पर असर
डोपामिन का असंतुलन बच्चों में मानसिक तनाव और चिड़चिड़ापन बढ़ाता है।
गेम न खेलने पर खालीपन और बेचैनी महसूस होती है।
वास्तविक जीवन की खुशियां फीकी लगने लगती हैं।
बच्चा सामाजिक रिश्तों से दूर होने लगता है।
अभिभावकों के लिए क्या है रास्ता
विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को इस डिजिटल चक्रव्यूह से बाहर निकालने में सबसे बड़ी भूमिका अभिभावकों की है। घर में संवाद की कमी अक्सर बच्चों को आभासी दुनिया की ओर धकेलती है। उन्हें भावनात्मक सहयोग और सुरक्षित माहौल देना जरूरी है।
इन बातों पर दें खास ध्यान
संवाद बढ़ाएं: बच्चों से रोजमर्रा की बातें करें और उनकी भावनाएं समझें।
स्वीकार्यता दें: उनकी कमजोरियों को अपनाएं और घर को ‘सेफ स्पेस’ बनाएं।
धीरे-धीरे गेमिंग कम करें: अचानक मोबाइल छीनने से टकराव बढ़ सकता है।
आउटडोर गतिविधियां बढ़ाएं: बच्चों को दोस्तों, खेल और असली दुनिया से जोड़ें।
निगरानी रखें: फोन का इस्तेमाल आपकी निगरानी में हो और दिनचर्या संतुलित रहे।