नई दिल्ली : आज माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि का दिन है. ऐसे में आज सारा देश बंसत पंचमी ( Basant Panchami) का त्योहार मना रहा है. इस त्योहार को मनाने के दो प्रमुख कारण हैं. पहला माता सरस्वती का जन्म दिवस और दूसरा बसंत ऋतु का आगमन. हिंदू मान्यता है कि माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि के दिन माता सरस्वती प्रकट हुईं थीं. इसलिए इस दिन माता की विशेष पूजा की जाती है. साथ ही व्रत भी किया जाता है.
ये हिंदू धर्म का बड़ा ही पावन पर्व माना जाता है. बसंत पंचमी के दिन विद्यार्थी और शिक्षक गुरुकुल और शैक्षणिक संस्थानों में विशेष पूजा आयोजित करते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये पावन पर्व सिर्फ हिंदू समाज के लोगों तक सीमित नहीं है? इस दिन दिल्ली की एक दरगाह पर पीली चादर और पीले रंग के गेंदे के फूल चढ़ाए जाते हैं.
दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर भी बसंत पंचमी के पर्व का उत्साह देखने को मिलता है. यह त्यौहार मुस्लिम और हिंदू समाज के लोगों को आपस में जोड़ने का काम करता है. दूर-दराज से लोग हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर पहुंचते हैं. मजार पर पीले फूल अर्पित करते हैं. इस दिन दरगाह पीली चादर और पीले रंग के गेंदे के फूलों से सजाई जाती है.
दरगाह पर पीली चादर चदार चढ़ाने का रिवाज बड़ा ही अनोखा है. आमतौर पर दरगाहों पर हरे रंग की चादर दिखती है, लेकिन बसंत पंचमी पीला रंग खुशहाली, ऊर्जा और बसंत ऋतु के आगमन का दिन माना जाता है. ऐसे में पीले फूल और पीली चादर दोनों से ही महौल खुशनुमा हो जाता है. इतिहासकार बताते हैं कि बसंत पंचमी के दिन दरगाह पर पीली चादर चढ़ाने का रिवाज 700 से 800 साल पुराना है.
कहा जाता है कि हजरत निजामुद्दीन औलिया निसंतान थे. वे अपने भांजे तकिउद्दीन को अपना बेटा मानते थे. दुर्भाग्य से तकिउद्दीन की मौत हो गई. इसके बाद औलिया उदास रहने लगे. ये देखकर उनके अनुयायी अमीर खुसरो को चिंता हुई. फिर एक दिन उन्होंने पीले वस्त्र और सरसों के फूलों के साथ नाचती और गाती महिलाओं को देखा. महिलाओं ने उनसे कहा कि पीला वस्त्र पहनकर फूल चढ़ाने से भगवान खुश होते हैं.
इसके बाद अमीर खुसरो पीले फूल लेकर हजरत निजामुद्दीन औलिया के पास गए. उन्होंने गीत गाया और नृत्य किया. ये सब देखकर हजरत औलिया मुस्कुराने लगे. तभी से बसंत पंचमी के दिन हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर पीली चादर चढ़ाई और पीले फूल सजाने की पंरपरा शुरू हो गई.