13 साल से कोमा में युवक: माता-पिता की याचिका पर इच्छा मृत्यु को मिली मंजूरी, संवेदनाओं को झकझोरने वाला मामला

गाजियाबाद के 33 वर्षीय हरीश राणा लंबे समय से जीवन रक्षक प्रणाली पर, सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने जीवन और मृत्यु को लेकर नई बहस छेड़ी

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कभी-कभी जीवन ऐसे मोड़ पर पहुंच जाता है, जहां उम्मीद और वास्तविकता के बीच की दूरी बहुत बड़ी हो जाती है। गाजियाबाद के रहने वाले 33 वर्षीय हरीश राणा का मामला भी कुछ ऐसा ही है, जिसने समाज को भावनात्मक और नैतिक दोनों स्तरों पर सोचने को मजबूर कर दिया है। पिछले 13 वर्षों से कोमा में पड़े हरीश राणा के लिए उनके माता-पिता ने इच्छा मृत्यु की अनुमति मांगी थी, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार कर लिया है।

 

13 साल से कोमा में हरीश राणा

मिली जानकारी के अनुसार हरीश राणा को करीब 13 साल पहले सिर में गंभीर चोट लगी थी। इस हादसे के बाद से वह अचेतन अवस्था यानी कोमा में हैं। डॉक्टरों की देखरेख में उन्हें जीवन रक्षक प्रणाली पर रखा गया है, लेकिन इतने लंबे समय में उनकी हालत में कोई खास सुधार नहीं हो पाया। लगातार वर्षों तक बेटे के ठीक होने की उम्मीद में इंतजार करने के बाद परिवार ने आखिरकार एक कठिन फैसला लिया और सुप्रीम कोर्ट में इच्छा मृत्यु की अपील दायर की।

 

माता-पिता की पीड़ा और विवशता

किसी भी माता-पिता के लिए अपने बच्चे के जीवन के बारे में ऐसा फैसला लेना बेहद कठिन होता है। लेकिन जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक अचेत अवस्था में हो और उसके ठीक होने की संभावना बहुत कम हो, तब परिवार के सामने भावनात्मक और मानसिक संघर्ष की स्थिति पैदा हो जाती है। हरीश राणा के माता-पिता ने भी 13 साल तक उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा। लेकिन समय के साथ हालात इतने जटिल हो गए कि उन्होंने अपने बेटे को लगातार चल रही पीड़ा से मुक्ति दिलाने के लिए न्यायालय का सहारा लिया।

 

महाभारत की कथा से मिलता भावनात्मक संदर्भ

भारतीय परंपरा और धर्मग्रंथों में भी जीवन और मृत्यु से जुड़े कई प्रसंग मिलते हैं। महाभारत में शिशुपाल की कथा इसका एक उदाहरण मानी जाती है। कहा जाता है कि शिशुपाल के जन्म के समय उसके शरीर पर अतिरिक्त अंग थे। उसकी मां को आकाशवाणी के माध्यम से बताया गया था कि जिस व्यक्ति की गोद में जाते ही उसके अतिरिक्त अंग गिर जाएंगे, वही उसके जीवन का अंत करेगा। जब शिशुपाल को भगवान श्रीकृष्ण की गोद में रखा गया तो ऐसा ही हुआ। इसके बावजूद उसकी मां ने अपने पुत्र के जीवन की रक्षा के लिए विनती की। यह कथा माता-पिता के अपने बच्चों के प्रति गहरे प्रेम और असहायता को दर्शाती है।

 

इच्छा मृत्यु पर फिर तेज हुई बहस

हरीश राणा का मामला एक बार फिर इच्छा मृत्यु यानी यूथेनेशिया को लेकर चर्चा में आ गया है। भारत में सुप्रीम कोर्ट कुछ विशेष परिस्थितियों में “पैसिव यूथेनेशिया” की अनुमति देता है, जिसमें मेडिकल प्रक्रिया और कानूनी मंजूरी के बाद जीवन रक्षक प्रणाली हटाने का फैसला लिया जा सकता है। इस तरह के मामलों में अदालत मेडिकल रिपोर्ट, डॉक्टरों की राय और परिवार की स्थिति को ध्यान में रखकर निर्णय लेती है।

 

निष्कर्ष

हरीश राणा का मामला केवल एक कानूनी फैसला नहीं, बल्कि एक परिवार की लंबी पीड़ा और संघर्ष की कहानी भी है। 13 वर्षों तक उम्मीद बनाए रखने के बाद उनके माता-पिता ने जो कदम उठाया, वह उनकी विवशता और साहस दोनों को दर्शाता है। यह घटना समाज के सामने यह सवाल भी रखती है कि जब जीवन केवल पीड़ा में बदल जाए, तब मानवीय संवेदनाओं और कानून के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

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