30 साल तक कराई नौकरी, फिर पेंशन से किया इनकार; हाईकोर्ट ने कहा- ‘खेल के नियम बीच में नहीं बदले जा सकते’

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प्रयागराज: एक कर्मचारी से करीब 30 साल तक सेवा लेने के बाद यह कहकर पेंशन देने से इनकार कर दिया गया कि जिस पद पर उसकी नियुक्ति हुई थी, वह पद ही मौजूद नहीं था। इस मामले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हैरानी जताते हुए कर्मचारी को राहत दी है। कोर्ट ने कहा कि जब सरकार ने नियुक्ति के बाद कर्मचारी से लगातार काम लिया है तो बाद में नियमों का हवाला देकर उसके अधिकारों से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने टिप्पणी की कि खेल के नियम बीच में नहीं बदले जा सकते।

नियुक्ति के बाद कर्मचारी से लगातार लिया गया काम

न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने कहा कि विज्ञापन जारी होने और चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद राज्य सरकार ने कोई शुद्धिपत्र जारी नहीं किया था। इसके बाद नियुक्ति पत्र जारी किया गया और कर्मचारी ने अपनी सेवाएं शुरू कर दीं।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अस्थायी व्यवस्था का गलत इस्तेमाल करके कर्मचारियों के अधिकारों का हनन करना संविधान में मिले समानता के अधिकार के खिलाफ है।

1997 में कनिष्ठ लिपिक के पद पर हुआ था चयन

मामला वर्ष 1997 का है। उस समय कनिष्ठ लिपिक के दो सामान्य पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया गया था। लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के बाद 31 जुलाई 1997 को जारी चयन सूची में बालकृष्ण शर्मा का नाम दूसरे स्थान पर था।

इसके बाद 12 सितंबर 1997 को उन्हें नियुक्ति पत्र जारी किया गया और उन्होंने पीलीभीत जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय में कार्यभार संभाल लिया। हालांकि, चयन प्रक्रिया पूरी होने के दौरान ही दोनों पदों में से एक पर मृतक आश्रित कोटे से नियुक्ति कर दी गई थी। वहीं मेरिट में प्रथम स्थान पाने वाले अभ्यर्थी को दूसरे पद पर नियुक्त किया गया।

विभाग ने बताया था अवकाश रिक्ति पर नियुक्ति

विभाग की ओर से बाद में तर्क दिया गया कि बालकृष्ण की नियुक्ति केवल अवकाश रिक्ति के तहत की गई थी। इसी आधार पर सितंबर 2000 में उनकी सेवा समाप्त कर दी गई।

बालकृष्ण ने सेवा समाप्ति के फैसले को अदालत में चुनौती दी। इस दौरान भी वह काम करते रहे। यानी पद से हटाए जाने का दावा करने के बावजूद विभाग उनसे सेवाएं लेता रहा। करीब तीन दशक की सेवा के बाद पेंशन के अधिकार को लेकर विवाद खड़ा हुआ।

हाईकोर्ट ने कहा, बीच में नहीं बदले जा सकते नियम

अदालत ने मामले में नियुक्ति प्रक्रिया, कर्मचारी से ली गई सेवाओं और विभाग के रुख को ध्यान में रखा। कोर्ट ने कहा कि चयन और नियुक्ति के बाद कर्मचारी से काम लेने के बाद बाद में व्यवस्था बदलकर उसके अधिकारों से इनकार नहीं किया जा सकता।

कार्यवाहक प्रधानाध्यापकों के वेतन पर भी बड़ा फैसला

उधर, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने कार्यवाहक प्रधानाध्यापकों के वेतन को लेकर भी महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि जो सहायक अध्यापक कार्यवाहक प्रधानाध्यापक के रूप में जिम्मेदारी निभाते रहे हैं, उन्हें प्रधानाध्यापक पद का वेतन उसी तारीख से मिलना चाहिए, जिस दिन से उन्होंने यह जिम्मेदारी संभाली थी।

अदालत ने बकाया वेतन के भुगतान को पिछले तीन साल तक सीमित करने वाले पूर्व आदेश में भी बदलाव किया है।

1030 याचियों की याचिका पर आया फैसला

न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की एकल पीठ ने पूनम रानी वाष्णेय समेत 1030 याचियों की ओर से दाखिल याचिका का निस्तारण करते हुए यह फैसला सुनाया।

याचियों का कहना था कि उनके विद्यालयों में नियमित प्रधानाध्यापक नियुक्त नहीं थे और वे अलग-अलग तारीखों से कार्यवाहक प्रधानाध्यापक के तौर पर जिम्मेदारी संभाल रहे थे। इसके बावजूद उन्हें प्रधानाध्यापक पद के अनुरूप वेतन नहीं दिया गया।

कोर्ट ने अपने पहले के फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें कार्यवाहक प्रधानाध्यापकों को नियमित प्रधानाध्यापक के समान वेतन पाने का अधिकार स्वीकार किया गया था।

 

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