मध्यपूर्व तनाव का पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर, तेल महंगा होने से जीडीपी और महंगाई पर बढ़ा खतरा

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मध्यपूर्व में जारी संघर्ष और वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की लगातार बढ़ती कीमतों का असर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर गंभीर रूप से पड़ने की आशंका जताई जा रही है। आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार यदि तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल या उससे अधिक बनी रहती हैं और क्षेत्रीय संघर्ष लंबा खिंचता है, तो पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति और कमजोर हो सकती है।

पाकिस्तान के पूर्व वित्त मंत्री Hafiz A. Pasha ने चेतावनी दी है कि यदि मध्यपूर्व में युद्ध छह महीने से अधिक समय तक जारी रहा और तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहीं, तो देश की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) पर 1 से 1.5 प्रतिशत तक नकारात्मक असर पड़ सकता है। अनुमान है कि ऐसी स्थिति में पाकिस्तान को अगले वर्ष करीब 12 से 14 अरब डॉलर तक का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है। इसका प्रमुख कारण पेट्रोलियम आयात में 25 से 30 प्रतिशत तक बढ़ोतरी और वैश्विक शिपिंग तथा बीमा प्रीमियम में तेज उछाल माना जा रहा है।

मध्यपूर्व संकट से रेमिटेंस पर भी खतरा

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा विदेशों से आने वाली रेमिटेंस पर निर्भर है। खासकर मध्यपूर्व से आने वाली रकम देश के कुल रेमिटेंस का लगभग 55 प्रतिशत हिस्सा होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि तेल आधारित अर्थव्यवस्थाओं में संभावित मंदी के कारण विदेशी श्रमिकों की मांग कम हो सकती है।

ऐसी स्थिति में पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों के श्रमिकों को सबसे पहले वापस भेजा जा सकता है, जिससे पाकिस्तान को 2 से 4 अरब डॉलर तक का नुकसान होने का अनुमान है। इन दबावों के कारण पाकिस्तान का चालू खाता घाटा लगभग 2 अरब डॉलर से बढ़कर 6 से 7 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है और अगले वित्त वर्ष 2026-27 में स्थिति और गंभीर होने की आशंका है।

तेल महंगा हुआ तो लौट सकती है दोहरे अंक वाली महंगाई

कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर देश की महंगाई दर पर भी पड़ सकता है। आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती है तो पाकिस्तान फिर से 2021-22 जैसे दौर में लौट सकता है, जब महंगाई करीब 30 प्रतिशत तक पहुंच गई थी।

पेट्रोल और ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोतरी से परिवहन लागत बढ़ेगी, जिसका असर अन्य वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर भी पड़ेगा। इससे आम लोगों की जीवनयापन लागत में तेजी से वृद्धि हो सकती है।

परिवहन, उद्योग और कृषि पर सबसे ज्यादा दबाव

बढ़ती ईंधन कीमतों का सबसे ज्यादा असर परिवहन क्षेत्र पर पड़ने की संभावना है, जहां लागत बढ़ने से मांग कमजोर हो सकती है। वहीं उद्योग क्षेत्र में LNG आयात में संभावित बाधाओं के कारण उर्वरक, बुनियादी ढांचा और टेक्सटाइल उद्योग प्रभावित हो सकते हैं।

कृषि क्षेत्र भी इस संकट से अछूता नहीं रहेगा। उर्वरक की कमी के कारण अगले फसल चक्र में उत्पादन घटने का खतरा है, जिससे खाद्य सुरक्षा और महंगाई दोनों पर असर पड़ सकता है।

ऊर्जा आपूर्ति पर बढ़ा दबाव, वैकल्पिक स्रोतों की जरूरत

आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से पाकिस्तान के तेल आयात बिल में लगभग 1.5 अरब डॉलर की वृद्धि होती है। यदि कीमतें 20 डॉलर तक बढ़ती हैं, तो देश को करीब 3 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ झेलना पड़ सकता है।

पूर्व स्टेट बैंक गवर्नर Ishrat Husain का मानना है कि घरेलू ईंधन कीमतों को वैश्विक बाजार के उतार-चढ़ाव के अनुसार नियमित रूप से समायोजित करना जरूरी है। कतर से आरएलएनजी आपूर्ति में संभावित बाधाओं के बाद पाकिस्तान को घरेलू गैस, कोयला, जलविद्युत, परमाणु ऊर्जा, पवन और सौर ऊर्जा जैसे विकल्पों पर अधिक निर्भर होना पड़ेगा।

आईएमएफ पर बढ़ती निर्भरता

पाकिस्तान की आर्थिक स्थिरता काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता पर निर्भर है। विश्लेषकों का कहना है कि देश की स्थिरीकरण प्रक्रिया में International Monetary Fund की भूमिका बेहद अहम बनी हुई है।

आर्थिक योजनाकार Kaiser Bengali के अनुसार आईएमएफ का सीमित वित्तीय सहयोग भी पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए राहत साबित हो सकता है। हालांकि बढ़ती ईंधन कीमतों का सीधा असर गरीब और मध्यम वर्ग पर पड़ रहा है, जबकि वर्क फ्रॉम होम और ऑनलाइन शिक्षा जैसी नीतियां केवल शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित रह गई हैं।

 

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