बस्तर के जंगलों में छिपे मौत के जाल को तकनीक से मात दे रहे सुरक्षाबल, हर कदम पर IED का खतरा

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नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के घने जंगलों में सुरक्षाबलों की कार्रवाई केवल ऑपरेशन नहीं, बल्कि हर कदम पर जिंदगी और मौत के बीच की जंग होती है। यहां जंगल की पगडंडियों और कच्ची सड़कों में छिपे आईईडी सुरक्षाबलों और आम लोगों के लिए लगातार बड़ा खतरा बने हुए हैं। हालांकि अब आधुनिक तकनीक और सतर्क रणनीति के सहारे जवान इस खतरे को मात देने की कोशिश कर रहे हैं।

21 फरवरी की सुबह बीजापुर के घने जंगलों में ऐसा ही एक अभियान चलाया गया। कांडलापरती-2 कैंप से निकली सीआरपीएफ की 214वीं वाहिनी के जवान नीलमड़गु गांव की ओर सर्च और एरिया डॉमिनेशन ऑपरेशन पर निकले थे। जंगल के रास्तों पर बढ़ते समय जवान हर कदम बेहद सावधानी से रख रहे थे, क्योंकि उन्हें पता था कि जमीन के नीचे कहीं भी विस्फोटक छिपा हो सकता है।

मेटल डिटेक्टर से मिला संकेत, बड़ी घटना टली

सर्च ऑपरेशन के दौरान डिमाइनिंग टीम को मेटल डिटेक्टर के जरिए जमीन के नीचे कुछ संदिग्ध संकेत मिले। जब जवानों ने मिट्टी हटाकर जांच की तो वहां 16 बीयर बोतल आईईडी और एक पांच किलो का प्रेशर कुकर आईईडी बरामद हुआ।

बम निरोधक दस्ते ने तुरंत कार्रवाई करते हुए सभी विस्फोटकों को सुरक्षित तरीके से निष्क्रिय कर दिया। अगर ये विस्फोटक समय रहते नहीं मिलते, तो यह रास्ता किसी बड़े हादसे का कारण बन सकता था।

25 साल में हजारों IED बरामद

बस्तर के जंगलों में आईईडी का खतरा कोई नई बात नहीं है। पिछले 25 वर्षों में सुरक्षाबलों के बम निरोधक दस्तों ने कुल 4,602 आईईडी बरामद किए हैं। इस दौरान 1,268 आईईडी विस्फोटों में 345 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए हैं, जबकि 917 जवान घायल हुए।

इन विस्फोटों का असर आम नागरिकों पर भी पड़ा है। अलग-अलग घटनाओं में अब तक 138 लोगों की जान जा चुकी है और 728 लोग घायल हुए हैं।

घायल होने के बाद भी ड्यूटी पर लौटे जवान

बस्तर में कई जवान ऐसे भी हैं जिन्होंने गंभीर चोटों के बावजूद हौसला नहीं छोड़ा। अप्रैल 2023 में जवान शंकर पारेट एक प्रेशर आईईडी विस्फोट में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। वहीं जुलाई 2024 में जवान किशन हपका ने आईईडी ब्लास्ट में अपना एक पैर गंवा दिया।

इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और इलाज के बाद फिर से ड्यूटी पर लौट आए। फिलहाल वे बीजापुर कोतवाली में पदस्थ हैं।

रणनीति बदली, तकनीक बनी सबसे बड़ा हथियार

बस्तर रेंज के आईजीपी सुंदरराज पी. के अनुसार सुरक्षाबलों ने पिछले अनुभवों से सबक लेते हुए अपनी रणनीति में बदलाव किया है। अब चार पहिया वाहनों की बजाय बाइक पेट्रोलिंग और पैदल गश्त को ज्यादा प्राथमिकता दी जा रही है।

इसके साथ ही आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ाया गया है। आईईडी डिटेक्टर, ड्रोन निगरानी और अन्य उन्नत उपकरणों की मदद से जंगलों में अभियान चलाए जा रहे हैं।

IED से निपटने के लिए इस्तेमाल हो रही आधुनिक तकनीक

बम निरोधक दस्ते अब कई आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं। मेटल डिटेक्टर की मदद से जमीन के नीचे छिपे धातु आधारित विस्फोटकों का पता लगाया जाता है। ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार मिट्टी के अंदर छिपी वस्तुओं की पहचान करने में सक्षम है। बम डिस्पोजल सूट जवानों को विस्फोट से सुरक्षा देता है।

इसके अलावा स्निफर डॉग स्क्वाड विस्फोटकों की गंध पहचानने में मदद करते हैं और ड्रोन के जरिए जंगलों तथा सड़कों की हवाई निगरानी की जाती है, जिससे संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखी जा सके।

बस्तर के बड़े IED हमलों का इतिहास

बस्तर क्षेत्र में कई बड़े आईईडी हमले हो चुके हैं। 3 सितंबर 2005 को बीजापुर के पोंजेर नाला में हुए विस्फोट में 24 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए थे। 17 मई 2010 को सुकमा के चिंगावरम में 16 जवानों और 15 नागरिकों की जान गई।

25 मई 2013 को झीरम घाटी हमले में 10 जवानों के साथ 17 नेताओं और नागरिकों की मौत हुई थी। 11 मार्च 2014 को सुकमा के टाहकवाड़ा में 15 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए, जबकि 2017 में बुरकापाल और चिंतागुफा में हुए हमलों में कई जवानों ने जान गंवाई।

9 अप्रैल 2019 को दंतेवाड़ा में हुए आईईडी विस्फोट में विधायक भीमा मंडावी समेत पांच लोगों की मौत हुई थी। 23 मार्च 2021 को नारायणपुर में पांच जवान शहीद हुए और 25 घायल हुए। 26 अप्रैल 2023 को दंतेवाड़ा के अरनपुर में 11 डीआरजी जवान शहीद हुए। हाल ही में 6 जनवरी 2025 को बीजापुर में हुए विस्फोट में आठ जवान और एक नागरिक की मौत हुई।

 

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