बारूद से कॉफी तक: बस्तर के जंगलों में बदली जिंदगी, पूर्व माओवादी अब कैफे और रोजगार से जोड़ रहे नई उम्मीद

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छत्तीसगढ़ के बस्तर की पहचान लंबे समय तक माओवादी हिंसा और बंदूकों की गूंज से जुड़ी रही, लेकिन अब यहां बदलाव की नई कहानियां सामने आ रही हैं। जिन हाथों में कभी हथियार और बारूद हुआ करते थे, वही हाथ आज चाय-कॉफी के कप सजाते नजर आ रहे हैं। मुस्कुराते हुए ग्राहकों को चाय परोसती फगनी उसेंडी की कहानी भी इसी बदलते बस्तर की तस्वीर पेश करती है।

फगनी जब बस्तर पंडुम कैफे में काम करते हुए लोगों को चाय देती है, तो यह विश्वास करना मुश्किल होता है कि कभी वही हाथ माओवादी दस्तों के साथ जंगलों में सक्रिय रहते थे। अब वह मुख्यधारा की जिंदगी में लौटकर आत्मनिर्भर बनने की कोशिश कर रही है।

10 साल की उम्र में माओवादी संगठन से जुड़ी थी फगनी

फगनी बताती है कि वर्ष 2005 में सलवा जुडूम आंदोलन के दौरान वह मात्र 10 वर्ष की थी, जब उसका संपर्क माओवादी संगठन से हुआ। ओरछा के आश्रम स्कूल में पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई करने के बाद जब वह अबूझमाड़ के जंगलों में बसे अपने गांव डुंगा लौटी, तो माओवादियों ने उसे अपने साथ जोड़ लिया।

शुरुआत में उसे संगठन की ‘डॉक्टर टीम’ में रखा गया, जहां दवाइयां देना और इंजेक्शन लगाना सिखाया गया। बाद में बोटेर गांव के रिवोल्यूशनरी पॉलिटिकल स्कूल में बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी दी गई। यहां वह करीब 50 बच्चों को माओवादी विचारधारा और संगठन का इतिहास पढ़ाती थी।

बीमारी के बाद मुख्यधारा में लौटी, अब कैफे में काम

वर्ष 2016 में बीमारी के कारण फगनी ने संगठन छोड़ दिया और मुख्यधारा की जिंदगी में लौट आई। सरकार की पुनर्वास नीति के तहत उसे कौशल विकास प्रशिक्षण मिला। प्रशिक्षण के बाद अब वह बस्तर पंडुम कैफे में काम कर रही है।

उसके साथ पदमी, कमलू और सुकालु सहित छह अन्य आत्मसमर्पित माओवादी भी यहां रोजगार से जुड़े हुए हैं। फगनी कहती है कि अब वह कभी हथियार नहीं उठाना चाहती, न पुलिस के लिए और न ही माओवादियों के लिए।

सिलाई मशीन से बदली मंगती की जिंदगी

बस्तर में बदलाव की ऐसी कई कहानियां सामने आ रही हैं। कोंडागांव जिले के कोडलियार गांव की रहने वाली मंगती भी माओवादी प्रभाव के कारण वर्ष 2015 में 16 साल की उम्र में संगठन में शामिल हो गई थी।

करीब दस वर्षों तक वह कुतुल एरिया कमेटी में सक्रिय रही। वर्ष 2025 में अपने पति संतू उर्फ बदरू के साथ उसने माओवादी संगठन छोड़कर मुख्यधारा का रास्ता चुना। पुनर्वास योजना के तहत उसे सिलाई मशीन का प्रशिक्षण मिला।

अब वह अपने घर पर ही सिलाई की छोटी दुकान चलाती है और हर महीने करीब सात से आठ हजार रुपये की आमदनी कमा रही है।

पूर्व माओवादी अब पर्यटन से भी जुड़ रहे

इसी तरह माओवादी संगठन के सबसे खतरनाक लड़ाकू दस्ते पीएलजीए बटालियन नंबर-एक से जुड़े रहे मड़कम आयता ने भी संगठन छोड़कर नई जिंदगी शुरू की है। पुनर्वास केंद्र में प्रशिक्षण मिलने के बाद वह अब सुकमा के पर्यटन स्थल तुंगल बांध में नाव संचालन का काम कर रहा है।

पुनर्वास नीति से बढ़ रहा मुख्यधारा की ओर रुझान

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा मार्च 2026 तक माओवादी हिंसा खत्म करने के लक्ष्य, सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव और सरकार की पुनर्वास नीति के कारण कई माओवादी अब मुख्यधारा में लौट रहे हैं। सरकार उन्हें आर्थिक सहायता, कौशल प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर उपलब्ध करा रही है।

इसी प्रयास का परिणाम है कि बस्तर में धीरे-धीरे बंदूक की जगह रोजगार और सम्मान की राह मजबूत होती दिख रही है।

बस्तर में बदलती तस्वीर

पिछले दो वर्षों में 2,700 माओवादियों ने हथियार छोड़कर मुख्यधारा का रास्ता अपनाया है।
789 आत्मसमर्पित माओवादियों को इलेक्ट्रीशियन, प्लंबर, टेलर और ड्राइविंग जैसे कौशल का प्रशिक्षण दिया गया है।
589 आत्मसमर्पित माओवादी फिलहाल कौशल विकास केंद्रों में प्रशिक्षण ले रहे हैं।

 

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