I-PAC छापेमारी विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: ममता बनर्जी के आचरण को लेकर कहा- ‘लोकतंत्र को खतरे में डालने वाला मामला’, जांच में हस्तक्षेप पर उठे गंभीर सवाल
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच में कथित हस्तक्षेप को लेकर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे आचरण से लोकतंत्र खतरे में पड़ सकता है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इसे केवल राज्य और केंद्र के बीच का सामान्य विवाद मानकर खारिज नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने आई-पैक के कार्यालय में की गई तलाशी के दौरान कथित बाधा डालने से जुड़े मामलों पर सुनवाई करते हुए कहा कि यदि किसी राज्य का मुख्यमंत्री जांच प्रक्रिया में हस्तक्षेप करता है तो इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर हो सकती है। पीठ ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि किसी भी मुख्यमंत्री का जांच के बीच हस्तक्षेप करना लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा बन सकता है और इसे केवल संघीय विवाद के रूप में नहीं देखा जा सकता।
सुनवाई के दौरान तर्क-वितर्क
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने ईडी की याचिका की वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा कि अनुच्छेद 32 के तहत यह याचिका केवल व्यक्तियों द्वारा दायर की जा सकती है, किसी सरकारी विभाग द्वारा नहीं। उन्होंने मामले को अनुच्छेद 131 के तहत अंतर-सरकारी विवाद बताया और इसे कानून का अनोखा मामला करार दिया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि हर मामले में किसी न किसी प्रकार का कानूनी प्रश्न होता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर याचिका को बड़ी पीठ को भेज दिया जाए।
पश्चिम बंगाल सरकार का पक्ष
पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि ईडी मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर अनुच्छेद 32 के तहत राहत नहीं मांग सकती। कोर्ट ईडी द्वारा लगाए गए उन आरोपों पर सुनवाई कर रहा था, जिनमें कहा गया था कि इस वर्ष की शुरुआत में तलाशी अभियान के दौरान उसके अधिकारियों को रोका गया था।
सीएम ममता बनर्जी का हलफनामा
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने जवाबी हलफनामे में सभी आरोपों से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि आई-पैक कार्यालय में उनकी उपस्थिति केवल तृणमूल कांग्रेस से जुड़े गोपनीय और मालिकाना डेटा को सुरक्षित करने के लिए थी। हलफनामे के अनुसार, 8 जनवरी 2026 को उन्होंने लाउडन स्ट्रीट स्थित प्रतीक जैन के आवास और बिधाननगर स्थित आई-पैक कार्यालय का दौरा किया था। उनका कहना है कि उन्हें सूचना मिली थी कि पार्टी का संवेदनशील राजनीतिक डेटा तलाशी के दौरान एक्सेस किया जा रहा है, जो आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति से जुड़ा था। उन्होंने यह भी दावा किया कि ईडी अधिकारियों से अनुरोध के बाद उन्हें कुछ दस्तावेज और उपकरण लेने की अनुमति दी गई थी और इसके बाद वे परिसर से लौट गईं ताकि किसी तरह की बाधा न हो। हलफनामे में यह भी कहा गया है कि तलाशी प्रक्रिया शांतिपूर्ण तरीके से जारी रही।
ईडी की दलीलें और याचिका
प्रवर्तन निदेशालय ने आरोप लगाया है कि तलाशी अभियान के दौरान उसके अधिकारियों को बाधित किया गया और इस मामले में एफआईआर दर्ज कर जांच सीबीआई को सौंपने की मांग की गई है। इससे पहले 15 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने ईडी अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर रोक लगाई थी और तलाशी स्थल के सीसीटीवी फुटेज व डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश दिया था। ईडी का कहना है कि कथित कोयला घोटाले से जुड़े मामले में यह कार्रवाई की गई थी और तलाशी के दौरान महत्वपूर्ण दस्तावेजों तक पहुंच बनाई गई, जिनमें चुनावी रणनीति से जुड़े डेटा भी शामिल थे। ईडी ने यह भी सवाल उठाया है कि तलाशी अभियान 2026 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले और लंबे समय बाद क्यों शुरू किए गए।