नई दिल्ली: सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व माना गया है। ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली अपरा एकादशी को अत्यंत पुण्यदायी और पापों का नाश करने वाली तिथि माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से व्रत रखने और भगवान विष्णु की पूजा करने से व्यक्ति को अनजाने में हुए पापों से भी मुक्ति मिलती है। शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि एकादशी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता, जब तक उसकी कथा का श्रवण या पाठ न किया जाए।
श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था अपरा एकादशी का महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महाभारत काल में धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष एकादशी के महत्व के बारे में पूछा था। तब भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि इस एकादशी को अपरा और अचला एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार त्रिविक्रम स्वरूप की पूजा की जाती है। मान्यता है कि श्रद्धा और भक्ति से यह व्रत करने वाले व्यक्ति को यश, कीर्ति और पुण्य की प्राप्ति होती है।
राजा महीध्वज और वज्रध्वज की कथा
प्राचीन समय में महीध्वज नाम के एक धर्मात्मा और न्यायप्रिय राजा हुआ करते थे। उनका छोटा भाई वज्रध्वज स्वभाव से अत्यंत क्रूर और अधर्मी था। वह अपने बड़े भाई से ईर्ष्या करता था। एक रात उसने अवसर पाकर राजा महीध्वज की हत्या कर दी और उनके शव को जंगल में पीपल के पेड़ के नीचे दबा दिया।
अकाल मृत्यु के कारण राजा महीध्वज की आत्मा को शांति नहीं मिल सकी और वे प्रेत योनि में भटकने लगे। कहा जाता है कि उनकी आत्मा उसी पीपल के पेड़ पर निवास करने लगी और वहां से गुजरने वाले लोगों को परेशान करने लगी।
ऋषि धौम्य ने दिलाई प्रेत योनि से मुक्ति
एक दिन धौम्य ऋषि उस जंगल से गुजर रहे थे। अपने तपोबल से उन्होंने प्रेत की पूरी कहानी जान ली। राजा की दुर्दशा देखकर ऋषि को दया आ गई। उन्होंने संकल्प लिया कि वे राजा को प्रेत योनि से मुक्त कराएंगे।
ऋषि धौम्य ने पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से अपरा एकादशी का व्रत किया और व्रत से प्राप्त समस्त पुण्य राजा महीध्वज को समर्पित कर दिया। मान्यता है कि व्रत के प्रभाव से राजा को तुरंत प्रेत योनि से मुक्ति मिल गई। इसके बाद उन्होंने दिव्य स्वरूप धारण किया और पुष्पक विमान में बैठकर स्वर्ग लोक की ओर प्रस्थान किया।
अपरा एकादशी व्रत के धार्मिक लाभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अपरा एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति, पुण्य की प्राप्ति और मानसिक शांति मिलती है। इसे मोक्ष प्रदान करने वाला व्रत भी माना गया है। श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, व्रत कथा और दान-पुण्य को विशेष महत्व देते हैं।