राजकुमार राव और सान्या मल्होत्रा की ‘टोस्टर’: अजीबोगरीब कॉन्सेप्ट, हल्की कॉमेडी और डार्क सस्पेंस का मिला-जुला पैकेज, लेकिन पूरी तरह नहीं पकड़ पाती रफ्तार

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‘टोस्टर’ एक ऐसी डार्क कॉमेडी है, जो अपने अनोखे और अलग कॉन्सेप्ट की वजह से शुरुआत में ही ध्यान खींचती है। एक साधारण से टोस्टर को केंद्र में रखकर बुनी गई यह कहानी अपराध, कन्फ्यूजन और अजीबोगरीब घटनाओं के बीच आगे बढ़ती है। राजकुमार राव और सान्या मल्होत्रा स्टारर इस फिल्म में हास्य और रहस्य का मिश्रण दिखाने की कोशिश की गई है, लेकिन कहानी अपनी शुरुआत की पकड़ को अंत तक कायम नहीं रख पाती।

कहानी में एक साधारण टोस्टर से शुरू होता है अराजकता का खेल
फिल्म की कहानी रमाकांत (राजकुमार राव) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो बेहद कंजूस और हिसाब-किताब रखने वाला इंसान है। वह अपने हर खर्च का पूरा हिसाब रखता है और तोहफे में दिए गए पैसे भी वापस मांगने तक पहुंच जाता है। कहानी तब मोड़ लेती है जब वह एक शादी में दिए गए टोस्टर को वापस लेने निकल पड़ता है, क्योंकि उस दंपति का तलाक हो चुका है। यहीं से घटनाएं तेजी से बदलती हैं और वही टोस्टर एक हत्या से जुड़ जाता है। घबराहट में रमाकांत उसे छिपाता है, लेकिन हालात और उलझते चले जाते हैं और वह खुद एक अराजक घटनाक्रम के बीच फंस जाता है।

अभिनय में राजकुमार राव की मजबूत पकड़, बाकी किरदारों को मिला सीमित स्पेस
राजकुमार राव एक बार फिर अपने किरदार में पूरी तरह ढलकर कहानी को संभालते नजर आते हैं। उनका रमाकांत का किरदार चिड़चिड़ा, जिद्दी और विचित्र है, जिसे उन्होंने प्रभावी तरीके से निभाया है। सान्या मल्होत्रा का प्रदर्शन अच्छा है, लेकिन उनका स्क्रीन स्पेस सीमित रहता है। अभिषेक बनर्जी अपने अंदाज के मुताबिक अलग रंग भरते हैं, जबकि अर्चना पूरन सिंह और सीमा पाहवा जैसे कलाकार छोटे लेकिन असरदार किरदारों में नजर आते हैं। कुल मिलाकर अभिनय मजबूत है, लेकिन सभी कलाकारों को पर्याप्त मौका नहीं मिल पाता।

निर्देशन में नया आइडिया, लेकिन कमजोर पड़ती रफ्तार
निर्देशक विवेक दासचौधरी ने एक बेहद अनोखे विचार को पर्दे पर उतारने की कोशिश की है। एक साधारण टोस्टर से शुरू होकर कहानी जिस तरह से डार्क कॉमेडी और अपराध की दुनिया में प्रवेश करती है, वह कई जगह दिलचस्प बनती है। लेकिन बीच में फिल्म की रफ्तार धीमी पड़ जाती है और कुछ दृश्य जरूरत से ज्यादा खिंचे हुए लगते हैं। शुरुआत की ऊर्जा अंत तक कायम नहीं रह पाती, जिससे कहानी का असर कम हो जाता है।

क्या है फिल्म की ताकत और कमजोरी
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका अलग और अनोखा कॉन्सेप्ट है। जब यह डार्क ह्यूमर पर फोकस करती है, तो कई सीन मनोरंजक बन जाते हैं। हालांकि, बीच का हिस्सा कमजोर पड़ जाता है और कुछ जगहों पर कॉमेडी असर नहीं छोड़ पाती। क्लाइमेक्स भी पूरी तरह स्पष्टता नहीं दे पाता, जिससे कहानी थोड़ी उलझी हुई लगती है।

देखें या नहीं
‘टोस्टर’ एक प्रयोगधर्मी फिल्म है, जिसमें आइडिया तो दमदार है लेकिन उसका पूरा असर स्क्रीन पर उतना मजबूत नहीं बन पाता। यह फिल्म पूरी तरह निराश नहीं करती, लेकिन पूरी तरह प्रभावित भी नहीं कर पाती। अगर आप अलग तरह की डार्क कॉमेडी और विचित्र कहानियों के शौकीन हैं, तो यह एक बार देखी जा सकती है।

 

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