‘मेड इन कोरिया’ फिल्म रिव्यू: प्रियंका मोहन की दमदार मौजूदगी, लेकिन हल्ल्यू संस्कृति की सतही पड़ताल में उलझी कहानी

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दुनिया भर में कोरियाई संस्कृति यानी के-ड्रामा और के-पॉप का क्रेज तेजी से बढ़ रहा है। इसी वैश्विक लहर की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म ‘मेड इन कोरिया’ एक ऐसी युवती की कहानी बताती है, जो दक्षिण कोरिया जाने के अपने सपने को सच करती है। फिल्म का विचार दिलचस्प है और इसका भावनात्मक आधार भी मजबूत लगता है, लेकिन कहानी का निष्पादन उतना प्रभावी नहीं हो पाता। हालांकि मुख्य किरदार में प्रियंका मोहन का अभिनय फिल्म को मजबूती देता है।

दक्षिण कोरिया के सपने के साथ शुरू होती है शेनबा की कहानी

फिल्म की कहानी तमिलनाडु की पहाड़ियों में बसे एक छोटे कस्बे में पली-बढ़ी शेनबा के इर्द-गिर्द घूमती है। स्कूल की एक फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता के दौरान उसे दक्षिण कोरिया के बारे में पहली बार पता चलता है और अपने राज्य से उसके संभावित ऐतिहासिक संबंध से वह प्रभावित हो जाती है।

यहीं से कोरियाई संस्कृति के प्रति उसका आकर्षण बढ़ने लगता है। उसके कमरे की दीवारों पर कोरियाई स्टार्स के पोस्टर लग जाते हैं, वह के-पॉप संगीत सुनती है और कोरियाई भाषा सीखने की कोशिश करती है। लेकिन जब वह सियोल पहुंचती है तो फिल्म यह ठीक से स्थापित नहीं कर पाती कि आखिर कोरिया या के-कल्चर में ऐसा क्या है जो उसे इतने गहरे स्तर पर आकर्षित करता है।

सियोल में नई जिंदगी की चुनौतियां

फिल्म के शुरुआती हिस्सों में शेनबा का सियोल में नया जीवन देखने को मिलता है। एक विदेशी शहर में अकेले रहने की चुनौतियां, नई संस्कृति को समझना और रोजमर्रा के नियमों के साथ तालमेल बिठाना—ये पल फिल्म के सबसे दिलचस्प हिस्सों में शामिल हैं।

उसे बस के लिए कतार में खड़ा होना सीखना पड़ता है, जो उसके लिए एक नया अनुभव है। इसी दौरान एक व्लॉगर उसकी मदद करती है और जल्द ही वह एक हवेली में घरेलू सहायक का काम करने लगती है, जहां वह बिस्तर पर पड़ी एक बुजुर्ग महिला की देखभाल करती है। यही संबंध फिल्म के भावनात्मक केंद्र को मजबूत करता है।

रोमांस से दूर, आत्म-खोज की कहानी

फिल्म की सबसे सकारात्मक बात यह है कि यह पारंपरिक रोमांस की राह पर नहीं चलती। इसके बजाय कहानी शेनबा और उसकी बुजुर्ग सहेली के बीच बनने वाले रिश्ते और आत्म-खोज की यात्रा पर केंद्रित रहती है।

एक मायने में यह कहानी उस भावनात्मक यात्रा की याद दिलाती है जिसमें एक युवा महिला नए देश में जाकर खुद को फिर से तलाशती है। हालांकि यहां रोमांच और गहराई उतनी मजबूत नहीं बन पाती जितनी कहानी से उम्मीद की जाती है।

कहानी में कई उपकथानक, असर होता है कमजोर

फिल्म का मूल विचार सरल और संवेदनशील है—एक लड़की की पहचान और समुदाय की तलाश। लेकिन बीच-बीच में कई अतिरिक्त कथानकों के जुड़ने से कहानी थोड़ी उलझ जाती है।

उदाहरण के तौर पर, शेनबा के दोस्तों के अचानक संगीत स्टार बनने के सपने की कहानी मुख्य कथा से ध्यान भटका देती है। दर्शक शायद शेनबा को अपने नए जीवन में छोटे-छोटे प्रयोग करते और आगे बढ़ते हुए देखना ज्यादा पसंद करते।

प्रियंका मोहन का अभिनय फिल्म की सबसे बड़ी ताकत

फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी प्रियंका मोहन का अभिनय है। वह शेनबा के किरदार को बेहद सहज और भावनात्मक तरीके से निभाती हैं। खासकर जब वह बुजुर्ग महिला के साथ स्क्रीन साझा करती हैं, तो दोनों के बीच एक सच्ची आत्मीयता महसूस होती है।

हालांकि सहायक कलाकारों के किरदार उतनी मजबूती से नहीं लिखे गए हैं। उनके बीच का रिश्ता और आपसी जुड़ाव स्पष्ट रूप से उभर नहीं पाता।

अच्छा विचार, लेकिन अधूरा असर

के-पॉप और के-ड्रामा की वैश्विक लोकप्रियता के दौर में इस तरह की क्रॉस-कल्चरल कहानी का विचार काफी प्रासंगिक लगता है। फिल्म यह दिखाने की कोशिश करती है कि कैसे दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के लोग कोरियाई संस्कृति से जुड़ाव महसूस करते हैं।

हालांकि फिल्म का उद्देश्य और भावना सराहनीय है, लेकिन पटकथा और निष्पादन में कमी के कारण इसका प्रभाव पूरी तरह मजबूत नहीं बन पाता।

फिलहाल यह फिल्म नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हो रही है।

 

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