तीन महीने का नुकसान पूरे साल के मुनाफे पर भारी, पेट्रोलियम कंपनियों की बढ़ी टेंशन; रोजाना 1200 करोड़ तक घाटे का दबाव
नई दिल्ली: कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर बनाए रखने की नीति ने देश की सरकारी पेट्रोलियम कंपनियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि सिर्फ पहली तिमाही का नुकसान पूरे वित्त वर्ष के मुनाफे को खत्म करने की स्थिति में पहुंच सकता है।
तेल कंपनियों पर बढ़ता वित्तीय दबाव
पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद से देश की सरकारी तेल विपणन कंपनियां—इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन—लगातार लागत से कम कीमत पर पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की आपूर्ति बनाए हुए हैं। जबकि कई देशों में इस दौरान या तो कीमतें बढ़ाई गईं या फिर राशनिंग लागू करनी पड़ी।
दो साल पुराने रेट पर बिक्री जारी
सूत्रों के मुताबिक, तीनों कंपनियां भारी अंडर रिकवरी यानी नुकसान का सामना कर रही हैं। अनुमान है कि पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की बिक्री पर मिलाकर रोजाना करीब 1200 करोड़ रुपये तक का घाटा हो रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि कच्चे तेल की कीमतों में करीब 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी के बावजूद पेट्रोल-डीजल की कीमतें पिछले दो वर्षों से स्थिर बनी हुई हैं।
एलपीजी की कीमतों में मार्च में केवल 60 रुपये प्रति सिलेंडर की बढ़ोतरी की गई थी, लेकिन यह भी वास्तविक लागत के मुकाबले काफी कम मानी जा रही है।
साल भर का मुनाफा खतरे में
सूत्रों के अनुसार, मौजूदा परिस्थितियों में सिर्फ अप्रैल-जून तिमाही में हुआ नुकसान ही करीब 76,000 करोड़ रुपये के वार्षिक मुनाफे को पूरी तरह खत्म कर सकता है। अगर मार्च महीने के नुकसान को भी जोड़ दिया जाए, तो कुल घाटा करीब 1 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
वर्तमान में कंपनियां अनुमानित रूप से पेट्रोल पर 14 रुपये प्रति लीटर, डीजल पर 42 रुपये प्रति लीटर और घरेलू एलपीजी पर करीब 674 रुपये प्रति सिलेंडर का नुकसान झेल रही हैं।
लंबे समय तक संकट जारी रहा तो हालात बिगड़ सकते हैं
इक्रा लिमिटेड के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट प्रशांत वशिष्ठ के मुताबिक, वैश्विक बाजार में कच्चे तेल और अन्य उत्पादों की ऊंची कीमतें कंपनियों के लिए भारी दबाव पैदा कर रही हैं। उनका कहना है कि 120 से 125 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर तेल कीमतें रहने पर कंपनियों को रोजाना लगभग 1000 करोड़ रुपये तक का घाटा उठाना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक जारी रही तो सरकारी तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिरता पर गंभीर असर पड़ सकता है और नीति स्तर पर बड़े फैसलों की जरूरत पड़ सकती है।